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Guru Teg Bahadur Singh Jauanti



गुरु तेग बहादुर सिंह का जन्म पंजाब के अमृतसर में 18 अप्रैल 1621, ई. को हुआ था वे सिक्खों के नौवें गुरु थे। ये गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। उनका बचपन का नाम त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया। युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से गुरु तेग बहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। गुरु तेग बहादुर जी ने 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की। गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। आध्यात्मिकता, धर्म का ज्ञान बाँटा। अंधविश्वासों की आलोचना कर नये आदर्श स्थापित किए। उन्होंने परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्य भी किए।  उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह सिक्खांे के दसवें गुरु बने। औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन किन श्लोकों का अर्थ राजा केे सामने नहीं करना था। पंडित के बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया। गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगजेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि वह अपने धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी। औरंगजेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया। औरंगजेब ने कहा सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें। जुल्म से ग्रस्त कश्मीर के पंडित गुरु तेग बहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि इस्लाम को स्वीकार करने के लिए उनपर अत्याचार किया जा रहा है। गुरु तेग बहादुर जब लोगों की व्यथा सुन रहे थे, उनके 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंद सिंह) वहाँ खड़े थे उन्होने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्याएं सुनी और अपने पिता जी से  कहा ‘आप बलिदान देकर हिंदुओं व हिन्दू धर्म को बचाइए।’
उन्होने कहा यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।’
तत्पश्चात गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगजेब से कह दें कि यदि गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’।
गुरु तेग बहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं गए। औरंगजेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेग बहादुर जी नहीं माने तो उन पर जुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेग बहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने। उन्होंने औरंगजेब से कहा- ‘यदि तुम जबर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए।’
औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चाँदनी चैक पर गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म जारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवम्बर 1675 को हँसते-हँसते बलिदान दे दिया। गुरु तेग बहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्ािल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है। गुरु तेग बहादुर जी की बहुत सी रचनाएँ ग्रंथ साहब में संग्रहित हैं। इन्होंने शुद्ध हिन्दी में सरल और भावयुक्त ‘पदों’ और ‘साखी’ की रचनायें की। उनके अद्वितीय बलिदान ने देश की ‘सर्व धर्म सम भाव’ की संस्कृति को सुदृढ़ बनाया और धार्मिक, सांस्कृतिक, वैचारिक स्वतंत्रता के साथ निर्भयता से जीवन जीने का मंत्र भी दिया।


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