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सगुण रंगो का पंचम स्त्रोत



महाराष्ट्र में रंग पंचमी के दिन होली खेलते हैं। महाराष्ट्र और कोंकण के लगभग सभी जगहों में इस त्योहार को रंगों के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। मछुआरों के गांव में इस त्योहार का मतलब नाच-गाना और मस्ती होता है। यह मौसम शादी तय करने के लिए ठीक माना जाता है क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक-दूसरे के घरों को मिलने जाते हैं और काफी समय मस्ती में बीताते है। महाराष्ट्र में पूरनपोली नाम का मीठा स्वाादिष्ट पकवान बनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस मौके पर जगह-जगह पर दही हांडी फोड़ने का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। दही-हांडी की टोलियों के लिए पुरस्कार भी दिए जाते हैं। इस दौरान हांडी फोड़ने वालों पर महिलाएँ अपने घरों की छत से रंग फेंकती हैं।चैत्र कृष्ण पंचमी को खेली जाने वाली रंगपंचमी आह्वानात्मक होती है। यह सगुण आराधना का भाग है। ब्रह्मांड के तेजोमय सगुण रंगों का पंचम स्रोत कार्यरत कर देवता के विभिन्न तत्वों की अनुभूति लेकर उन रंगों की ओर आकृष्ट हुए देवता के तत्व के स्पर्श की अनुभूति लेना, रंगपंचमी का उद्देश्य है। पंचम स्रोत अर्थात पंच तत्वों की सहायता से जीव के भाव अनुसार विभिन्न स्तरों पर ब्रह्मांड में प्रकट होने वाले देवता का कार्यरत स्रोत। रंगपंचमी देवता के तारक कार्य का प्रतीक है। इस दिन वायुमंडल में उड़ाए जाने वाले विभिन्न रंगों के रंग कणों की ओर विभिन्न देवताओं के तत्व आकर्षित होते हैं। ब्रह्मांड में कार्यरत आपतत्वात्मक कार्य तरंगों के संयोग से होकर जीव को देवता के स्पर्श की अनुभूति देकर देवता के तत्व का लाभ मिलता है।रंगों के त्यौहार होली पर मालवा अंचल, इन्दौर के आसपास का इलाका जरा ज्यादा ही रंगीन हो जाता है। होली के पाँच दिन बाद रंगपंचमी का त्योहार मनाया जाता है जिसमें फिर से एक बार रंगों से एक दूसरे को डुबोया जाता है। कहीं कहीं ‘गेर’ निकलती है जो एक प्रकार का बैंड-बाजा-नाच-गाना युक्त जुलूस होता है जिसमें नगर निगम के फायर फाइटरों में रंगीन पानी भर कर जुलूस के तमाम रास्ते भर लोगों पर रंग डाला जाता है। जुलूस में हर धर्म के, हर राजनीतिक पार्टी के लोग शामिल होते हैं, प्रायः महापौर (मेयर) ही जुलूस का नेतृत्व करता है।होली का एक और विस्तार रंगपंचमी के रूप में पूरे मालवा और निमाड़ अंचलों में पूरी धूमधाम से होता है। इसमें टेपा सम्मेलन, हास्य कविसम्मेलन और बजरबट्टू सम्मेलन जैसे कई जमावड़े समाए हैं जो रंगपंचमी के बहाने इंदौर शहर की उत्सवधर्मिता का पता देते हैं। पूरे आलम में दिल खोल कर की जाने वाली मस्ती, छेडछाड, चुहलबाजी सम्मिलित रहती है। इस सब में चार चाँद लगा देती हैं रंग-रंगीली गेर। गेर एक तरह का चल-समारोह है जिसमें गाना है, नृत्य है, जोश है, बड़ी बड़ी मिसाइले हैं जिनसे पाँच पाँच मंजिलों तक रंगों के फव्वारे फूट पड़ते हैं। शहर के पुरातन क्षेत्र से निकलने वाली ये ‘गेर’ अलग अलग संस्थाओं द्वारा निकाली जाती हैं। चार से पाँच घंटों पर सड़क पर निकलता अलबेलों का ये कारवाँ इन्दौर की जनता को एक अनूठी उत्सवप्रियता से भर देता है। इस दिन पूरा शहर गुलाल और रंग से तर-बतर होकर सड़क पर आ जाता है। अलग अलग भेष धरे जाते हैं, स्वांग की शान होती है, और महिला-पुरुष मिल कर होली के गीत गाते चलते हैं। मजे की बात यह है कि इन गेर में कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं होता है। कोई भी सम्मिलित हो सकता है और मस्ती का हमसफर बन सकता है। न किसी तरह की मनुहार और न निमंत्रण की दरकार।



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