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गणपति बप्पा मोरया



 

भाद्र पक्ष शुक्ल चतुर्थी को दोपहर में गणेश जी का जन्म हुआ था। पूरे देश में गणेश चतुर्थी के दिन गणेशजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। मोदक उन्हें अतिप्रिय है। अतः मोदक का भोग लगाकर प्रार्थना की जाती है कि वे हमारे घर को धन धान्य से परिपूर्ण करें।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभः।

निर्विघ्नं कुरू में देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस के मंगलाचरण में गणेश जी की वंदना करते हुए इस प्रकार अतिसुन्दर वर्णन किया है।

जो सुमिरन सिधि होई गन नायक करिवर वदन।

करउ अनुग्रह सोई बुधि रासि शुभ गुण सदन।।

गणेश सत, रज और तम तीनों गुणों के भगवान हैं। प्रणव स्वरुप ओंकार ही भगवान की मूर्ति हंै जो वेद मंत्रों के प्रारंभ में प्रतिष्ठित है।

ओंकार रुपी भगवानुक्तसत गणनायकः।

यथा कार्येषु सर्वेषु पूज्यते औ विनायकः।।

ऋग्वेद में भी कहा गया है कि ”न ऋतेत्वतकियते किं चन्तरे“ अर्थात् हे गणेश जी तुम्हारे बिना कोई भी कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता। पुराणों में पंचतत्व की उपासना कही गयी है। ये पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इनके अधिपति क्रमशः शिव, गणेश, भगवती, सूर्य और विष्णु हैं। नारद पुराण के अनुसार ”गणेशादि पंचदेव ताभ्यो नमः“ गणेश जी ब्रह्मांड और उसके विशिष्ट तत्वों के प्रतीक होने के कारण दार्शनिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। गणेश जी बल, बुद्धि और पराक्रम के धनी हैं। जब देवताओं ने संसार की परिक्रमा में प्रथम आने की शर्त रखी तो उन्होंने बुद्धि चातुर्य दिखाया। और विचार किया कि ‘रमन्ते चराचरेषु संसारे’ और उन्होंने अपने माता-पिता की परिक्रमा की और रुक गये। तब से वे देवताओं के अग्रगण्य बने और अग्र पूजा के अधिकारी हुए।

विघ्ननाशक और सिद्धि विनायक गणेश की विनायक के रुप में पूजन की परंपरा प्राचीन है किंतु पार्वती अथवा गौरीनंदन गणेश का पूजा बाद में प्रारंभ हुआ। ब्राह्मण धर्म के पांच प्रमुख सम्प्रदायों में गणेश जी के उपासकों का एक स्वतंत्र गणपत्य सम्प्रदाय भी था जिसका विकास पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच हुआ। वर्तमान में सभी शुभ कार्यो के आरंभ में गणेश जी की पूजा करने की प्रथा है। लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजन चंचला लक्ष्मी पर बुद्धि के देवता गणेश जी के नियंत्रण के प्रतीक रुप में की जाती है स्वतंत्र मूर्तियों के साथ गणेश जी को शिव परिवार के सदस्य के रुप में लगभग 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच शिव और शक्ति की मूर्तियों में उत्कीर्ण किया गया।

गणेश जी के बारह नाम क्रमशः सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्ण, लंबोदर, विकट, विघ्न विनाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणेशाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। सिद्धि सदन एवं गजवदन विनायक के उद्भव का प्रसंग ब्रह्मवैवर्त्य पुराण के गणेश खंड में मिलता है। इसके अनुसार पार्वती जी ने पुत्र प्राप्ति का यज्ञ किया। उस यज्ञ में देवता और ऋषिगण आये और पार्वती जी की प्रार्थना को स्वीकार कर भगवान विष्णु ने व्रतादि का उपदेश दिया। जब पार्वती जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तब त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ अनेक देवता उन्हें आशीर्वाद देने पहंुचे। सूर्य पुत्र शनिदेव भी वहां पहंुचे। पार्वती जी ने निसंकोच होकर गणेश जी को देखने की अनुमति दे दी। शनिदेव की दृष्टि बालक पर पड़ते ही बालक का सिर धड़ से अलग हो गया और कटा हुआ सिर भगवान विष्णु में प्रविष्ट हो गया। तब पार्वती जी पुत्र शोक में विव्हल हो उठीं। भगवान विष्णु ने तब सुदर्शन चक्र से पुष्पभद्रा नदी के तट पर सोती हुई हथनी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़कर उसे जीवित कर दिया। तब से उन्हें ”गणेश“ के रुप में जाना जाता है।

दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी समय शंकर जी वहां आए। उन्होंने अंदर जाने लगे, तो बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शंकर जी ने बालक गणेश को समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने एक न सुनी। क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, यह देखकर पार्वती जी दुखी होकर रुदन करने लगी जो शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सार्मथ्य और शक्तियां प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।

गणेश सभी राशियों के अधिपति माने गये हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि ”कला चण्डीविनायकौ“ अर्थात् कलयुग में चण्डी और विनायक की अराधना सिद्धिदायक और फलदायी है। सतयुग में दस भुजा वाले गणेश जी सिंह पर विराजमान होते हैं, त्रेतायुग में मयूर और कलयुग में मूषक उनका वाहन है।

महोत्कट विनायक- इन्हें कृत युग में कश्यप व अदिति ने जन्म दिया। इस अवतार में गणपति ने देवतान्तक व नरान्तक नामक राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना की व अपने अवतार की समाप्ति की।

गणेश- त्रेता युग में गणपति ने उमा के गर्भ से जन्म लिया व उन्हें ”गणेश“ नाम दिया गया। इस अवतार में गणपति ने सिंधु नामक दैत्य का विनाश किया व ब्रह्मदेव की कन्याएं, सिद्धि व रिद्धि से विवाह किया।

गणेश- द्वापर युग में गणपति ने पुनः पार्वती के गर्भ से जन्म लिया व गणेश कहलाए, परंतु गणेश जन्म से ही कुरुप थे, इसलिए पार्वती ने उन्हें जंगल में छोड़ दिया, जहां पर पराशर मुनि ने उनका पालन-पोषण किया। गणेश ने सिंदुरासुर का वध कर उसके द्वारा कैद किए अनेक राजाओं व वीरों को मुक्त किया। इसी अवतार में गणेश ने वरेण्य नामक अपने भक्त को गणेश गीता के रुप में शाश्वत तत्व ज्ञान का उपदेश दिया।

दाईं सूंड- जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है माना जाता है जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है। इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को ”जागृत“ माना जाता है। ऐसी मूर्ति की पूजा में कर्मकांड के अंतर्गत पूजा विधि के सभी नियमों का पालन करना आवश्यक है। उससे सात्विकता बढ़ती है व दक्षिण दिशा से प्रसारित होने वाली रज लहरियों से कष्ट नहीं होता। दक्षिणाभिमुखी मूर्ति की पूजा सामान्य पद्धति से नहीं की जाती, क्योंकि तिर्य्क (रज) लहरियां दक्षिण दिशा से आती हैं। दक्षिण दिशा में यमलोक है, जहां पाप-पुण्य का हिसाब रखा जाता है।

बाईं सूंड- जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है। इसलिए पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है। इसकी पूजा प्रायिक पद्धति से की जाती है। महाराष्ट्र में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं तथा जलाशयों पर उमड़े जनसैलाव व उनकी आस्था को देखकर मन भावविभोर हो उठता है। इस दिन समस्त श्रद्धालुग गणेश-प्रतिमा को हाथों, रथों व वाहनों पर उठा कर बहुत धूम-धाम से गाजों-बाजों के साथ इसे प्रवाहित करने के लिए पैदल ही जलाशयों की ओर चल पड़ते हैं और ऊंची आवाज में नारे लगाते हैं, ”गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया, पुर्चा वर्षी लौकरिया।“ जिसका अर्थ होता है कि ”ओ परमपिता गणेश जी! मंगल करने वाले, अगले बरस जल्दी आना।“

उपाय

बुधवार के दिन घर में सफेद रंग के गणपति की स्थापना करने से समस्त प्रकार की तंत्र शक्ति का नाश होता है।

धन प्राप्ति के लिए बुधवार के दिन श्री गणेश को घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो जाता है।

परिवार में कलह कलेश हो तो बुधवार के दिन दूर्वा के गणेश जी की प्रतिकात्मक मूर्ति बनवाएं। इसे अपने घर के देवालय में स्थापित करें और प्रतिदिन इसकी विधि-विधान से पूजा करें।

मुख्य दरवाजे पर गणेशजी की प्रतिमा लगाने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं करती।



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