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गुड़ी पड़वा



चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या उगादि कहा जाता है। इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। ‘गुड़ी’ का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों से बना है ‘युगादि‘। 
ब्रह्माजी ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतः ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अतः इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। इस दिन को वर्षारंभ भी कहा जाता है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पित्तयों के बंदनवार से सजाया जाता है। यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के परिचायक हैं। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी गुड़ी पड़वा कोे सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की। वर्ष के साढ़े तीन मुहूर्तो में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। 
शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिए और इस सेना की मदद से शिक्तशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ। लोगों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिणी प्रजा को मुक्ति दिलाई। बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज फहराए। आज भी घर के आंगन में गुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया।
इस अवसर पर आंध्र प्रदेश के घरों में ‘पच्चड़ी को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर होता है। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें जो चीजें मिलाई जाती हैं वे हैं गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम। गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होती हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से आम खाया जाता है। नौ दिन तक मनाया जाने वाला यह त्यौहार दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होता है।


उगादि आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के महत्वपूर्ण त्योहार से एक है। उगादि दक्षिण भारत में भी बसंत के मौसम का स्वागत करता है। इन दिनों में चमेली के फूल की खुशबू सबसे अधिक लोकप्रिय होतीे है। तेलगु और कन्नड़ लोग बहुत जोश और उत्साह के साथ उगादि मनाते हैं। दिन एक व्यापक तेल स्नान के साथ शुरू होता है। घरों को साफ सुथरा रखा जाता है। दरवाजे आम के पत्तों सेे सजाया जाता है। रंगोली से घरों को सजाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य नए कपड़े पहनते हैं और सभी मंदिरों में भक्तों की भीड़ के साथ रहते हैं।



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