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कालाष्टमी या ‘भैरवाष्टमी’



 

कैसे होगी निरोगी काया

मार्गशीर्ष मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन भगवान शिव, भैरव रूप में प्रकट हुए थे इस दिन को कालाष्टमी या ‘भैरवाष्टमी’ के नाम से जाना जाता है। भगवान भोलेनाथ के भैरव रूप के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।

व्रत विधि

भगवान शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को रात्रि के समय जागरण करके शिव शंकर एवं पार्वती की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए। भैरव कथा का श्रवण करना चाहिए। मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए। भगवान भैरवनाथ का वाहन ‘श्वान’ (कुत्ता) है। अतः इस दिन प्रभु की प्रसन्नता हेतु कुत्ते को भोजन कराना चाहिए। इस दिन प्रातः काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राद्ध व तर्पण करके भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं तथा दीर्घायु प्राप्त होती है। भैरव जी की पूजा व भक्ति करने से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर रहते हैं। व्यक्ति को कोई रोग आदि स्पर्श नहीं कर पाते। कालाष्टमी के दिन काल भैरव के साथ-साथ देवी कालिका की पूजा-अर्चना एवं व्रत का भी विधान है। काली देवी की उपासना करने वालों को अर्धरात्रि के बाद माँ की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए, जिस प्रकार दुर्गापूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है। भैरव उपासना के द्वारा क्रूर ग्रहों के प्रभाव से छुटकारा मिलता है।

कालाष्टमी की कथा

एक समय श्रीहरि विष्णु और ब्रह्मा के मध्य विवाद उत्पन्न हुआ कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इस हद तक बढ़ गया कि समाधान के लिए भगवान शिव एक सभा का आयोजन करते हैं। इस सभा में महत्वपूर्ण ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि उपस्थित थे। सभा में लिए गये एक निर्णय को भगवान विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं, किंतु ब्रह्मा जी इस निर्णय से संतुष्ट नहीं होते। वे महादेव का अपमान करने लगते हैं। शांतचित शिव यह अपमान सहन न कर सके और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किये जाने पर उन्होंने रौद्र रुप धारण कर लिया। भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रुप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। भैरव जी श्वान पर सवार थे, उनके हाथ में दण्ड था। हाथ में दण्ड होने के कारण वे ‘दण्डाधिपति’ कहे गये। भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था। उनके रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह भगवान भोलेनाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे। भैरव जी ब्रह्मा एवं अन्य देवताओं और साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत हो जाते हैं।

कष्टों से मुक्ति का दिन

कालाष्टमी भगवान श्री भैरव और मां कालिका के पूजन का दिन है। वक्री शनि के प्रभाव और साढ़े साती से गुजर रहे जातकों के लिए कष्टों से मुक्ति के लिए यह सबसे उपयुक्त दिन होता हैभगवान कालाष्टमी पर उपाय करने से कार्य बंधंन, रोग, कष्ट, क्लेश, आकस्मिक धनहानि दूर होती है।

1 साबुत उड़द के 11 बड़े, लाल फूल, लाल मिठाई, एक कुल्हड़ जल और नींबू शाम के समय भगवान श्री भैरव पर

चढ़ाएं। निम्न मंत्र का जाप करें....

‘आं हृीं क्रों बं बटुकाय

आपदुउद्धारणाय कुरु-कुरु

बटुकाय बं क्रों हृीं आं स्वाहा’

अगर आपको किसी तंत्र बाधा या शत्रु का भय है, तो निम्न मंत्र का 108 बार भैरव जी के सामने बैठकर जाप करें

ऊँ हृीं बटुकाय आपदुद्धारणाय

रक्षां कुरु ऊँ

अगर आपको कार्य में अचानक बंधन या घर में अचानक से हानि-क्लेश लगता है, तो ये भोग पहले पूरे घर में घुमाएं और फिर भैरव जी को चढ़ाएं.

1 साबुत उड़द के आटे की रोटी बनाएं। उस पर तेल लगाएं और मीठा करके कुत्ते को खिलाएं।

2 अगर कोई रोगी है, तो ऊपर बताई गई रोटी उसके ऊपर से उतारकर ऊपर लिखा मंत्र पढ़ते हुए कुत्ते को डाल दें।

3 भैरव जी की मूर्ति पर सवा सौ ग्राम साबुत उड़द चढ़ाएं। ऊपर लिखे मंत्र का जाप करने के बाद प्रसाद स्वरूप 11 उड़द के दाने उठा लें। अपने कार्यस्थलपर ये दानें भगवान भैरव जी से मंगलकामना करते हुए बिखेर दें.



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