Acharya Indu Prakash
Fashion Blog

It's common knowledge that a large percentage of Wall Street brokers use astrology.

Acharya Indu prakash

शीतला अष्टमी



शीतला अष्टमी महत्वपूर्ण पर्व है, देवी शीतला की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से आरंभ होती है।
बसोडा-शीतला अष्टमी के दिन शीतला माँ की पूजा अर्चना की जाती है तथा पूजा के पश्चात बासी ठंडा खाना ही माता को भोग लगया जाता है जिसे बसोड़ा कहा जाता हैं। वही बासी भोजन प्रसाद रूप में खाया जाता है तथा यही नैवेद्य के रूप में समर्पित सभी भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
धर्म और ग्रंथों के अनुसार शीतला देवी चेचक रोग कि देवी हैं, यह हाथों में कलश, सूप, मार्जन(झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किए होती हैं तथा गर्दभ की सवारी किए यह अभय मुद्रा में विराजमान हैं। शीतला माता के संग ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चैंसठ रोग, घेंटुकर्ण, त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं इनके कलश में दाल के दानों के रूप में शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। मान्यता है कि शीतलाष्टक स्तोत्र की रचना स्वयं भगवान शिव जी ने लोक कल्याण हेतु की थी।
शीतला माता जी की पूजा बहुत ही विधि विधान के साथ कि जाती है, शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। देवी को भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग ‘बसौड़ा’ उपयोग में लाया जाता है। इस दिन माता की कथा का श्रवण होता है। शीतला माता की वंदना के उपरांत मंत्र का उच्चारण किया जाता है।
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम।।
पूजन समाप्त होने पर भक्त माता से सुख शांती की कामना करते है। मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में समस्त शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं, दाहज्वर, पीतज्वर, चेचक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्र विकार आदी रोग दूर होते हैं। 
किसी गाँव में एक महिला रहती थी। वह बासोड़े के दिन शीतला माता की पूजा करती थी। ठंडी रोटी का भोग माता को चढ़ाकर उसी को खाती थी उस दिन उसके घर में चूल्हा नहीं जलाता था। उस गाँव में और कोई शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गाँव में आग लग गयी और उस महिला के घर को छोड़ कर सभी के घर उस आग में जल गए। जिससे सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। सभी लोगो ने इस चमत्कार का कारण उस महिला से पूछा तो उस महिला ने कहा की वह बासोड़े के दिन ठंडा भोजन ग्रहण कराती है और शीतला माता की पूजा करती है। इस कारण से माता जी की कृपा से उसकी झोपड़ी अग्नि में जलने से बच गयी और तुम लोगो की झोपड़ी जल गयी। तब से उस गाँव में बसोड़े के दिन शीतला माता की पूजा होने लगी।
देवी शीतला की पूजा से पर्यावरण को स्वच्छ व सुरक्षित रखने की प्रेरणा प्राप्त होती है तथा ऋतु परिवर्तन होने के संकेत मौसम में कई प्रकार के बदलाव लाते हैं और इन बदलावों से बचने के लिए साफ सफाई का पूर्ण ध्यान रखना होता है। शीतला माता स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। चेचक रोग जैसे अनेक संक्रमण रोगों का यही मुख्य समय होता है अतः शीतला माता की पूजा का विधान पूर्णतः महत्वपूर्ण एवं सामयिक है।



Advertise

Your AD Here

Related Articles


Contact Us

Now You can publish your articles with us. if selected it will be publised in our magazines after taking your conformation