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सूर्य की धनु संक्रांति



सूर्य एक साल में 12 में राशियों में परिभ्रमण करता है जिसकी वजह से 12 संक्रांतिया होती है जिनके बारे में हमने पिछले अंकों में भी लिखा है और इसी क्रम में इस बार हम सूर्य की धनु संक्रांति के बारे में चर्चा कर रहें है...


भारत में ज्योतिष शास्त्र का बहुत आधिक महत्व है । जिसके माध्यम से बड़े-बड़े विद्वान शुभ और अशुभ समय की गणना करते है और उससे सामान्य मनुष्य को अवगत करते है । इन समयों की गणना ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति से लगाई जाती है । सूर्य के एक राशी से दूसरी राशी में गोचर या परिभ्रमण की अवस्था संक्रांति कहलाती है । ज्योतिष शास्त्र की गणना के आधार पर 12 राशियों में सूर्य का परिभ्रमण अलग-अलग मास गणना के अनुसार होता जाता है अर्थात् एक मास में सूर्य की एक संक्रांति ही आती है जो लगभग 30 दिनों तक चलती है । इस प्रकार साल में 12 संक्रांति होती है । संक्रांतियों के नाम क्रमशः - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन है । संक्रांति दिन अथवा रात्रि किसी भी समय हो सकती है इसका कोई निश्चित समय नहीं होता । 
सूर्य का धनु राशी में प्रवेश- सूर्य का धनु राशी में प्रवेश लगभग पौष मास में होता है । इसलिए धनु संक्रांति पौष मास में आती है । इस वर्ष यह संक्रांति । दिसंबर को पड़ रही है । धनु राशी का स्वामी बृहस्पति है । मुहूर्त चिंतामणि व सूर्य सिद्धांत शास्त्र के अनुसार बृहस्पति की दो राशियां धनु और मीन में जब सूर्य का प्रवेश होता है तो खर अथवा मल मास आता है । इस प्रकार सूर्य के धनु में प्रवेश के साथ ही खर मास की शुरूआत होती है । पूरे वर्ष में दो मास का खर या मल मास होता है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार खर मास को अशुभ मन जाता है । इस समय कोई भी शुभ काम जैसे विवाह, गृह प्रवेश, दुकान का शुभारम्भ नहीं करनी चाहिए । खर मास में सूर्य देव की उपासना करनी चाहिए । इस मास में सूर्य की साधना और उपासना करने से उन्नति होती है, सफलता प्राप्त होती है साथ ही बल, बुद्धि, दिव्या ज्ञान, स्वास्थ्य लाभ, तेज आदि प्राप्त होता है । सूर्य की उपासना का उल्लेख चारों वेदों और अनेकों पुराण जैसे- तैतरीय आरण्यक, पद्म पुराण, लिंग पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि में मिलता है । इस पूरे ब्रह्माण्ड में सूर्य देव ही है जो प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहते है और जिनके प्रभाव को आसानी से अनुभव कर सकते है । अपने तेज से वो पूरे विश्व को प्रकाशित करते है और जीवन जीने के लिए ऊर्जा प्रदान करते है । सूर्य देव की कृपा से ही प्रकृति में जीवन का संचार संभव है । इसी लिए सूर्य देव का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है । खर मास में प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व उठ कर नित्य कर्मों से निवृत्त होना चाहिए । उसके बाद स्नान करके भगवान सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए और सूर्य की आराधना करनी चाहिए । अघ्र्य देते समय निम्न मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए- ‘ऊँ घृणिः सूर्याय नमः’, ‘ऊँ भानवै नमः’, ‘ऊँ आदित्याय नमः’, ‘ऊँ खगाय नमः’ या ‘ऊँ ही सः’ । सूर्य सहस्त्रनाम या आदित्यहृदय स्त्रोत का पाठ करने से हृदय रोग तथा पाण्डू रोग (पीलिया) आदि से छुटकारा मिल सकता है । ऋग्वेद में सूर्य की महिमा का वर्णन किया गया है जिसमे कन्वतनयमहर्षि प्रषकंव ने सूर्य देव से प्रार्थना करते हुए कहा-
उद्यन्नः मित्रमह आरोहन्नुतरां दिवम ।
हद्रोगं मम सुर्यहरिमानं च नाशय ।।
(ऋग्वेद 1/50/11)
अर्थात्- हे सूर्य देव ! आज उदय होते हुए और आकाश में आगे बढ़ाते हुए मेरे हृदय रोग को हर लीजिये।
 



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