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सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन का वैज्ञानिक पहलु



बचपन से ही हमे पढा़या जाता है की सूर्य पूरब से निकलता है पर अगर खगोलविज्ञान का अध्ययन करें तो साल में सिर्फ दो दिन ही होते है जब सूर्य ठीक पूरब से निकलता है व अन्य पूरे साल सूर्य कुछ उत्तर या दक्षिण की तरफ होता है, यही घटना सूर्य का उत्तरायण होना या दक्षिणायन होना है । अगर हम उत्तरायण और दक्षिणायन शब्द पर ध्यान दें तो दोनों दो-दो शब्दों से मिल कर बने है- उत्तर व अयन और दक्षिण व अयन जहां अयन का अर्थ गमन होता है अर्थात् उत्तर में गमन व दक्षिण में गमन । साल में सिर्फ दो दिन ही होते है जब मध्यामह्न में सूरज हमारे ठीक ऊपर होता है और उस समय हमारी परछाई नहीं दिखाई देती । ये दो दिन 21 मार्च और 21 सितम्बर के आसपास आते है । इन दो दिनों को विज्ञान की भाषा में शुन्य छाया दिवस कहते है । हम जानते है की पृथ्वी अपने अक्षांश में 23.5 डिग्री झुकी हुई है और निरंतर अपनी धुरी में घूमती रहती है साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी घूमती रहती है । निरंतर अपनी धुरी में घूमने की वजह से दिन व रात्रि होती है और झुके होने की वजह से दिन और रात्रि का समय बराबर नहीं होता है । इन सभी वजहों से पृथ्वी में सूर्य की किरणे निरंतर बराबर नहीं पड़ती है और ऋतुओं में परिवर्तन होता रहता है । 
अब सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन की बात करें तो सूर्य का केंद्र दिसम्बर माह की 21 तारीख को दक्षिण-पूर्व के शीर्ष बिंदु पर होता है और उसी दिन से सूर्य उत्तर की तरफ गति करना शुरू कर देता है साथ ही इस दिन सूर्य मकर रेखा के ऊपर चमकता है । इस तरह सूर्य 21 दिसम्बर से निरंतर उत्तर दिशा में गति करता रहता है और 21 जून के आसपास वह उत्तर-पूर्व के शीर्ष पर पहुंच जाता है जिसके बाद सूर्य फिर से दक्षिण दिशा में गति करनी शुरू कर देता है । इस प्रकार क्रमशः छः-छः माह सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन रहता है ।
शिशिर ऋतु का प्रारंभ-
हिन्दू पंचांग के वर्ष को छः ऋतुओं में बांटा गया है- बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर । इस प्रकार हेमंत ऋतु के बाद शिशिर ऋतु का प्रारंभ होता है । जिस दिन सूर्य उत्तरायण होता है उस दिन से हेमंत ऋतु समाप्त हो जाती है और शिशिर ऋतु की शुरुआत हो जाती है । खगोल विज्ञान के आधार पर देखें तो उत्तरायण से पहले जब सूर्य दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ता है तो धीरे-धीरे ठण्ड बढ़ती है और जब सूर्य दक्षिण की दिशा को समाप्त करके उत्तर की दिशा में चलने लगता है, तो ठण्ड कम होने लगती है । इस प्रकार अगर देखें तो जब दक्षिण पूर्व के शीर्ष पर सूर्य होता है तो सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधे नहीं पड़ती । जिसकी वजह से दिन छोटे और रात बड़ी होती है और ठण्ड अधिक होती है । लेकिन जब सूर्य उत्तरायण होता है तो सूर्य की किरणे सीधी पड़ने लगती है जिससे दिन बड़े होने लगते है और रातें छोटी हो जाती है और जब सूर्य उत्तर पूर्व के शीर्ष पर होता है तो सबसे अधिक गर्मी पड़ती है और सबसे बड़े दिन होते है ।
हिन्दू धर्मशास्त्रों और आयुर्वेद में शिशिर ऋतु का बहुत अधिक महत्व है । इस ऋतु में पाचन शक्ति अच्छी होती है और इस समय के त्योहारों में तिल का बहुत अधिक महत्त्व होता है । आध्यात्मिक द्रष्टि से सूर्य के उत्तरायण का समय बहुत महत्वपूर्ण माना गया है । हमारा इतिहास बताता है की ज्यादातर लोगों को ज्ञान की प्राप्ति इस समय हुयी । सबसे ज्यादा प्रसिद्ध कथाओं में भीष्म की कथा है जिसका वर्णन महाभारत में मिलता है । पितामह भीष्म बाणों की शय्या में पड़े सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते रहे । क्यों की वो प्रकृति के इस संक्रांति काल का लाभ उठाना चाहते थे । इसी तरह गौतम बुद्ध ने भी सूर्य के उत्तरायण होने के बाद तीसरी पूर्णिमा को ज्ञान प्राप्त किया था । ऐसे ही भारत में अनेक ऋषि-मुनि और विद्वान हुए जिन्होंने इस समय अपना देह त्यागा.
 



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