Acharya Indu Prakash
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क्रांतिकारी संत



किसी का उदय अचानक नहीं होता सूर्य हमेषा धीरे-धीरे ऊगता है और ऊपर उठता है । जिसमें धौर्य और तपस्या होगी वही इस लोक को प्रकाषित कर सकता है...

स्वामी श्रद्धानंद जी ने महर्षि दयानंद सरस्वती के आदर्शों पर चलकर समाज के हित और कल्याण में कई सारे काम किये । बचपन में स्वामी श्रद्धानंद जी का नाम मुंशीराम था । बचपन में यह बहुत ही चंचल स्वभाव के थे । जिससे उनेक पिता नानकचंद जी बहुत परेशान रहते थे । एक रोज श्रद्धानंद के पिता उन्हें महर्षि दयानंद सरस्वती के पास बरेली में एक सतसंग में ले गए जहां उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उनका रुझान आर्य समाज के प्रति आकर्षित हुआ । महर्षि दयानंद जी के विचारों को श्रद्धानंद जी ने जन मानस तक पहुंचाया । स्वामी श्रद्धानंद जी ने गुरूकुल की स्थापना की और दुबारा से वैदिक काल की शिक्षा प्रारंभ की । इन्होंने शिमला के कांगड़ा में ”गुरुकुल कांगड़ी नामक विश्वविद्यालय“ की स्थापना की जो आज के समय में भी भारत में वैदिक शिक्षा को बढ़ावा देने वाले विश्वविद्यालय मे से एक है । स्वामी श्रद्धानंद जी एक संत होने के साथ-साथ भारत की आजादी में क्रांतिकारी भूमिका निभाने वाले भी रहे । जिस दौरान महात्मा गांधी साउथ अफ्रिका में संघर्ष कर रहे थे । उस समय श्रद्धानंद जी ने 1500 रुपये अपने विद्यार्थियों से एकत्रित करके उन्हें मदत पहुचाई । अंग्रेजी हुकुमत के द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के प्रति आवाज उठाना और उनकी हर गलत कृतियों पर विरोध जाहिर करने का काम भी श्रद्धानंद जी ने किया । स्वामी श्रद्धानंद ने एक प्रमुख आंदोलन ”शुद्धि आंदोलन“ की शुरुआत की । इस आंदोलन में गैर हिंदुओं को पुनः उनके मूल रुप में वापस लाने के लिए और उनकी घर वापसी के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया गया । स्वामी श्रद्धानंद जी सनातन धर्म के प्रचारक भी थे । इन्होनें शंकराचार्य जी का प्रवचन भी अपने गुरुकुल में कराया था । 23 दिसंबर को स्वामी श्रद्धानंद का बलिदान दिवस मनाया जाता है । क्योंकि इसी दिन सन 1926 में अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने धर्म-चर्चा के नाम पर उनके कक्ष में दाखिल हुआ और गोली मारकर उनकी हत्या दी । जिसके बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई ।
 



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