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गुरु गोविंद सिंह प्रकाश पर्व



गोविंद सिंह के पिता गुरु तेगबदादुर की शहादत तब हुई जब उनकी उम्र महज 9 साल की थी । इसके बाद से ही गुरुगोविंद सिंह गुरु जी को गुरु के रुप में गद्दी पर बैठाया गया और उन्होनें कई सारी भाषाओं जैसे पंजाबी, अरबी, फारसी, संस्कृत का ज्ञान लिया..


गुरु गोविंद सिंह को उनके साधारण स्वभाव, धर्म ज्ञान, बेहतरीन सैन्य क्षमता और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के लिए जाना जाता है । गुरु गोविंद सिंह का जन्म 22 दिसम्बर 1666 को बिहार के पटना में हुआ । यह सिख समुदाय के दसवें और अंतिम गुरु बने । इन्होनें ही खालसा का सजृन भी किया था । गुरु तेगबहादुर और माता गुजारी के पुत्र गोविंद सिंह का जब जन्म तब हुआ जब भारत में मुगलों का शासन था । उस दौर का शासक औरंगजेब हिन्दुओं को जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाकर मुस्लिम बनाता था । गोविंद सिंह के पिता गुरु तेगबदादुर की शहादत तब हुई जब उनकी उम्र महज 9 साल की थी । इसके बाद से ही गुरुगोविंद सिंह गुरु जी को गुरु के रुप में गद्दी पर बैठाया गया और उन्होनें कई सारी भाषाओं जैसे पंजाबी, अरबी, फारसी, संस्कृत का ज्ञान लिया । गुरुगोविंद सिंह ने ज्ञान के साथ-साथ शस्त्रों से जुड़ी कला भी सिखी जिसमें उन्होनें तलवार, भाला, और धनुष-वाण भी चलाना सीखा । गोविंद सिंह जी ने सिखों को दो महत्वपूर्ण आंदोलनों से जोड़ा । इसमें सबसे पहले उन्होनें मुगलों के खिलाफ फौज तैयार की और दूसरा विरोधी पहाड़ी जनजातियों के खिलाफ भी आंदोलन छेड़ा । गोविंद सिंह जी को महान विद्वानों की श्रेणी में भी रखा जाता है । इन्होने दो महत्वपूर्ण रचनायें जफरनामा और विचित्र रचनाएं की । इनके दरवार में 52 कवियों को नियुक्त किया गया था । गोविंद सिंह जी ने सिख बंधुओं और समाज के सभी वर्गों को कुछ महत्वपूर्ण ज्ञान दिया था । जिसमें उन्होनें“ काम करन विच दरिदार नहीं करना (काम करने से कोई परहेज नहीं करना और खुब मेहनत करना) ”धन, जवानी ते कुल जात दा अभिमान नै करना“ (अपनी कुल जाति और जवानी का अभिमान नहीं करना), ”धरम दि किरत करनी“ (ईमानदारी से जिना चाहिए और और अपनी जीविका सही ढ़ग से चलाना चाहिए), ”गुरुवानी कंठ करनी“ (गुरुवानी को सही ढ़ंग से रट लेना चाहिए), बचन करकै पालना (जो भी वादा किया है, उसको निभाना चाहिए), किसी की निंदा, चुगली अतै इर्खा नै करना (किसी की भी निंदा या चुगली नहीं करना और किसी से भी ईष्या की भावना मत रखना । आदि ज्ञान दिए थे ।
गुरु गोविंद सिंह जी ने की खालसा पंथ की स्थापना- गुरु गोविंद सिंह जी ने सन् 1699 ई में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की । खालसा का अर्थ है सिखों का समुह जो अधर्म, अनीति और दुराचार के खिलाफ जाकर समाज में शांति भाव प्रदर्शित करता है । खालसा समाज की स्थापना करते समय गुरुगोविंद सिंह जी ने अलग- अलग जाति के लोगों को अमृत पान करवाकर पंच प्यारों का दर्जा दिया और खुद भी उन पंच प्यारों के हाथ से अमृत पान किया । खासला को ”काल पुरख की फौज“ नाम गुरु गोविंद सिंह जी ने ही दिया था । इन्होनें ही ”वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतह“ का नारा भी दिया था ।
 



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