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लोहड़ी (lohri)



बुरी नजर से बचाये लोहड़ी
यह त्योहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल एवं कश्मीर में धूम धाम से मनाया जाता है। लोहड़ी के मौके पर कन्या के मायके से लड़की की मां कपड़े, मिठाईयां, गजक, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भेजती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। शादी के बाद जिनकी पहली लोहड़ी होती है या जिनके घर संतान का जन्म होता है उनके लिए लोहड़ी का त्योहार बड़ा खास होता है। लोहड़ी को सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का स्वागत पर्व भी माना जाता है।
माना जाता है कि जब दक्ष प्रजापति ने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया और पुत्री सती का निरादर किया तो क्रोधित सती ने आत्मदाह कर लिया। इसके बाद दक्ष को इसका बड़ा दंड भुगतना पड़ा। दक्ष की गलती को सुधारने के लिए ही माताएं लोहड़ी के मौके पर पुत्री को उपहार देकर दक्ष द्वारा किए अपराध का प्रायश्चित करती हैं।
लोहड़ी के मौके पर होलिका दहन की तरह लकडि़यों एवं उपलों का ढ़ेर बनाया जाता है। शाम के समय लकडि़यों को जलाकर सभी लोग आग के चारों ओर नाचते गाते हैं। माताएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर लोहड़ी की आग तपाती हैं। माना जाता है कि इससे बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। और बुरी नजरों से रक्षा होती है।
पवित्र अग्नि में लोग रवि फसलों को अर्पित करते हैं। क्योंकि इस समय रवि फसलें कटकर घर आने लगती हैं। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि, अग्नि में समर्पित की गयी सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओ तक पहुंच जाती है।
लोहड़ी की पवित्र अग्नि में रेवड़ी, तिल, मूँगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित किए जाते हैं। इस तरह से लोग सूर्य देव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है। सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो और घर अन्न धन से भरा रहे। लोहड़ी पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी लगे थे। इसी समय कंस ने लोहिता नामक राक्षसी को भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा। लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता के प्राण हर लिये। इस उपलक्ष में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी रखा गया।
लोहड़ी की कथा और इतिहास
मकड़ संक्रांति के पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला यह उत्सव पंजाब का प्रमुख पर्व लोहरी के रूप में मनाया जाता है। खास कर जिसके घर में नवविवाहित जोड़े होते हैं उनके घर की खुशी तो और भी कई गुना बढ़ जाती है। क्योंकि यह प्रथा इस पर्व के महत्व से जुड़ा हुआ है। बच्चे इस अवसर पर कंड्डे और लकड़ी जमा करते हैं, जिनके घर में नई नई शादी होती है बच्चे उनके घरों से पैसे आदि लेकर मूंगफली, गजक, गुर पट्टी आदि खरीदते हैं। आग के अलाव जलाकर उसके चारों ओर भांगड़ा करते हैं। जलती हुई आग में तिल गुड़ और मूंगफली आदि का भोग लगाते हैं और उपस्थित लोगों को भी मूंगफली, रेवड़ी आदि बांटते हैं। जिस परम्परागत गीत को गाया जाता है, उससे जुड़ी एक पौराणिक गाथा भी है, लेकिन छोटे बच्चे गीत को कुछ यूं गाते हैं:-
हुली नी माये हुले।
दो बेरी पत्थर दुल्ले।।
दो दिल पईयां खजूरां
खजूरां सुटियां मेवा,
इस नब्बी दा करो मंगेवा।।
लोहड़ी का त्योहार विशेष रूप से मुगल काल में घटी एक घटना से जुड़ा है। लोहड़ी का त्योहार अब्दुल्ला भाटी की याद में मनाया जाता है। भारत में मुगल शासन के दौरान पश्चिमोŸार प्रान्तों में अनेक स्वत्रंत क्रान्तिवीर थे जो मुगल सत्ता को स्वीकार नही करते थे। मूलतः ये हिन्दू लोगही थे जो स्थानीय भाषाई प्रभाव के तहत अपने मुसलमानी नाम रख लेते थे। ये मुसलमान नहीं थे। मुगलांे ने इस विद्रोही को पकडने के सारे प्रयास किये थे, लेकिन वह गरीबों का हमजोली था, इसलिए सदैव बच निकलता था। लोग उसे अपने घर में छिपा लिया करते थे, उसे पूजते थे। एक बार एक गरीब ब्राह्मण की लड़की जिसका नाम ‘सुंदर मुंदरिये’ था जब उसकी शादी करने का वक्त आया तो गरीब ब्राह्मण ने दुल्ला भट्टी डाकू से फरियाद की। दुल्ला भट्टी मुस्लिम नही था, और वह दिल में प्यार रखता था। जब वह ब्राह्मण के घर आया तो उसने देखा कि लड़की का कोई भाई नहीं है, तो वह सुंदर मुंदरिये का भाई बन गया। वह घर के लोगों को वचन दे गया कि वह सुंदर की शादी में जरूर आएगा व पूरी मदद करेगा। यह वचन पाकर ब्राह्मण की जान में जान आ गयी और वह निश्चिंत हो गया।
लेकिन, यह खबर जब अकबर बादशाह तक पहुंची कि सुंदर मुंदरिये की शादी में दुल्ला भट्टी आएगा तो बादशाह ने शादी के दिन सब तरफ चैकसी बढ़ा दी व सैनिक तैनात कर दिये। इधर, ब्राह्मण को चिंता होने लगी, किंतु शादी के दिन वादे के अनुसार अपनी बहन की शादी में दुल्ला भट्टी आया। कहा जाता है कि अपने साथ में ढेरों शादी के साजो सामान, चुन्नियां, कपड़े व जेवरात भी लाया। यहां तक कि वह साथ में सौ मन शक्कर भी गाड़ी पर लदवाकर लाया। शादी पूरी रस्म-रिवाज के साथ संपन्न हुई और जब सुंदर मुंदरिये की विदाई का समय आया तो उसे डोली में बिठाकर बारातियों को देने के लिए साथ में लायी शक्कर को अपनी शाल में भरकर सामने कर दिया, जिसके बोझ से शाल फट गयी। खैर! विदाई के बाद अकबर के सिपाहियों ने डाकू दुल्ला भट्टी को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर जमकर लड़ाई हुई और अंत में दुल्ला भट्टी मारा गया। तब से यह घटना प्रेम व भाईचारे का प्रतीक बन गयी कि दुल्ले ने अपनी बहन की शादी में जान तक दे दी और तब से लेकर आज तक इस प्रसंग के परिप्रेक्ष्य में लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है व दुल्ला भट्टी की याद में यह गीत बड़े जोर-शोर व आदर के साथ गाया जाता है।
सुंदरी-मुंदरी
तेरा कौन बिचारा
दुल्ला भट्टी वाला हो
सेर शक्कर पाई हो
कुड़ी दे बोझे आई हो
कुड़ी दा सालू पाटा हो
कुड़ी दा लाल पताका हो। 
इस गीत को सभी एक साथ गाते हैं व बाद में ‘हो’ को जोर से उच्चारित करते हैं। लोहड़ी के दिन रात के वक्त आग जलायी जाती है व सभी लोग उसके इर्द-गिर्द जमा होते हैं व खुशियों के गीत गाकर रेवडि़यां, मक्के के फुल्ले, खजूर व अन्य प्रसाद वितरित करते हैं। पंजाबियों में इस त्योहार को जिस लड़के व लड़की की शादी की पहली वर्षगांठ हो, उसे और भी खुशी से मनाते हैं, साथ ही घर में नवजात बच्चे होने पर भी परम्परागत तरीके से यह त्योहार मानते हैं। हालांकि, लोहड़ी का यह पर्व पूरे देश में मनाया जाने लगा है, लेकिन फिर भी लोहड़ी का असली मजा व धूम तो पंजाब, जम्मू-कश्मीर व हिमाचल में ही देखने को मिलती है।
एक अन्य कथा के मुताबिक इस दिन अब्दुल्ला भाटी ने इस छोटी बच्ची को एक मुगल सूबेदार के चंगुल से छुड़या था। फिर जंगल में ही उस बच्ची की शादी योग्य वर के साथ करवा दी। जंगल में कोई पंडि़त तो था नही जो शादी करवाता तो खुद दुल्ला भाटी ने आग जला कर फेरे करवाये और उसके पास जो कुछ भी था मक्के के फुल्लो, रेवडि़यां, खजूर आदि उस अग्नि में ड़ाल दिये और उपरोक्त गीत गाया।



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