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रम्भा एकादशी



देवी रम्भा की पूजा करने वाली स्त्री के व्यक्तिव में चुंबकीय आकर्षण उत्पन्न हो जाता है और दांपत्य जीवन

अलौकिक सुख से भर जाता है।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रम्भा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस कृष्ण पक्ष की एकादशी के दौरान तुला राशि के सूर्य की उपस्तिथि में अप्सरा साधना श्रेयस्कर कर मानी गई है. वास्तव में अप्सरा एक ऐसा एनर्जी पैटर्न है जिसे आत्मसात कर कोई भी स्त्री स्वयं अप्सरा रूप हो सकती है.. इस बार ये दिन 7 नवंबर को है। इस बार 7 नवंबर को शनिवार का दिन उत्तर फागुनी नक्षत्र और वैधृति योग है सूर्य के नक्षत्र और शनि के दिन जबकि सूर्य देव नीच राशि में गोचर कर रहे हो तो थोड़ी सी साधना करके बहुत कुछ पाया जा सकता है। दोपहर 13:47 बजे से अगले सूर्योदय तक कई ऐसे मुहूर्त है जिसमे ये साधना की जा सकती है. जैसे दोपहर 13:47 बजे से लेकर 14:48 बजे ,,14:48 बजे से 16:09 बजे तक तीसरा शाम 17:31 से 19:09बजे तक ,रात 20: 48 बजे से रात 01:43 बजे तक और फिर सूर्योदय के समय 05:00 से 06:39 बजे के बीच इस अप्सरा साधना को किया जा सकता है ।

देवी का स्वरुप : रम्भा देवी स्वेत वस्त्र पहनती हैं । कमर में नीचे एक घाघरा या स्कर्ट और ऊपर संक्षिप्त कंचुकी के अलावा स्वेत उत्तरीय वस्त्र (दुप्पटा) होता हैं । देवी का रंग गुलाबी हैं, आँखे बड़ी -बड़ी और देवी सफेद और लाल फूलों के आभूषण पहनती हैं ।

अप्सरा साधन मंत्र:

रं... रं। …रम्भा रं... रं.... देवी

पूजन सामग्री: दो दर्जन काली चूड़ियाँ पैरों में लगाने का आलता , परफ्यूम , बालो में गूँथने की चोटी, नाक में पहनने की कील, 6 कौड़ियां, पैरों की पायल , 2 एक सामान जल पात्र ( गिलास या लोटे ) सफेद रेशमी वस्त्र और लाल फूल

कैसे करें पूजा: एक चौकी पर सारी सामग्री रख कर दोनों जल पात्रो में जल भर कर अपनी दायीं और बायीं ओर रख ले, समस्त सामग्री को देखते हुए सिर उठा कर ऊपर छत की ओर ध्यान से देखें । किसी बिंदु को देखते हुए धीरे - धीरे अपनी आँखे बंद कर लें । धीरे - धीरे अपनी गर्दन सीधी कर लें और बंद आँखों से ध्यान करें कि देवी चौकी पर विराजमान हैं । ध्यान में ही अपनी लायी हुई सारी पूजा की सामग्री देवी को अर्पित कर दे , चूड़ियाँ हांथो में पहना दे , पैरो में आलता लगा दें और पायल पहना दें, पूर्ण श्रृंगार करके देवी को परफ्यूम से नहला दें । ये सारा काम ध्यान में भाव से ही होगा । वास्तव में कुछ नहीं करना । देवी की अर्चना के बाद अपने दोनों ओर रखे जल पात्र पर अपना दोनों हाथ रख दें । हथेली से जल पात्र को ढक कर मन्त्र का जाप शुरू कर दें । 10-10 मिनट करके 3 बार जप करें हर बार जप के अंत में अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ कर अपने चेहरे को सहलाएं और सारे शरीर पर स्पर्श करें । जप के दौरान आपके हाथ की हथेली बहुत गर्म हो जाये तो कुछ समय के लिए जप रोक दें । देवी को धन्यवाद कह कर एक बार पुनः जप शुरू कर दें । ध्यान रहे की इस जप में हथेलियों में थोड़ी गर्मी महसूस हो सकती हैं । यही रम्भा का आवेश हैं । आवेश शक्ति स्वरुप शरीर में आता हैं । किसी - किसी को गर्मी लगती है । किसी - किसी को गर्मी नहीं लगती हैं । पूजा के बाद सारी सामग्री वही रखे रहने दें अगले दिन सुबह सारी सामग्री उठा कर अपने पास रख लें । फूल बहते पानी में विसर्जित कर दे और कौड़ियां सफेद कपड़े में लपेट कर तिजोरी में रख दें , आलता , पायल और शेस सारी सामग्री का स्वयं इस्तेमाल करें ।



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