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भगवान शिव का व्यक्तित्व



भगवान शिव देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। शिव को संहारक, महेश, भोलेनाथ, रुद्र अनेकों नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्माजी सृष्टि के निर्माता हैं तो विष्णुजी पालन-पोषण करने वाले हैं। शिव भगवान संहार करने का कार्य करते हैं, इस कारण उन्हें संहारक भी कहा जाता है। भगवान शिव देवताओं के भी देव है इसीलिए उन्हें महेश अर्थात महा़ईश कहा गया है। भगवान शिव अपने भक्तों की जरा सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए भोलेनाथ कहे जाते हैं। भगवान शिव के रौद्र रुप के कारण उन्हें रुद्र के नाम से भी पुकारा जाता हैं। भगवान शिव के रुद्र नाम का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। भोलेनाथ व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। भोलेनाथ की अर्धांगिनी का नाम पार्वती है, इनके पुत्रों का नाम कार्तिकेय तथा गणेश है। भगवान शिव योगी के रुप में वास करते हैं। शिव अपने रौद्र रुप तथा सौम्य आकृति दोनों के लिए विख्यात हैं। यह सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार के अधिपति देवता हैं। इनकी लीला अदभुत है। इनके मस्तक पर चन्द्रमा विराजमान है और साँप उनके गले का हार बनकर झूल रहा है।ये योगी भी हैं और गृहस्थ जीवन में भी लीन हैं। यह अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित कहलाते हैं। इनके परिवार में भूत-प्रेत, साँप, छछूंदर, सिंह, नन्दी, मूषक, मोर आदि सभी शामिल है। सभी को यह सम दृष्टि से देखते हैं। इन्हें महाकाल भी कहा गया है। महाकाल की आराधना करने का महापर्व ‘महाशिवरात्रि’ कहलाता है।जो व्यक्ति शिव को प्रसन्न करना चाहते है उन्हें ‘महाशिवरात्रि’ का व्रत तथा पूजन अवश्य करना चाहिए। शिवरात्रि का व्रत करने वाले व्यक्ति सांसारिक भोगों को भोगने के पश्चात अंत में शिवलोक में जाते है। शिवरात्रि के व्रत तथा पूजन के पश्चात व्रत का पारण चतुर्दशी में किया जाता है।भगवान शिव की पूजा महाशिवरात्रि के दिन रात्रि के चारों प्रहर तक करनी चाहिए। धतूरे के पुष्पों से शिवलिंग पर पूजन करना चाहिए। भगवान शिव को बिल्वपत्र तथा धतूरे के फूल बहुत प्रिय हैं. इसलिए शिव पूजन में इनका प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इस दिन ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से सभी प्रकार की बाधायें दूर हो जाती है। इन महामंत्रों का 108 बार जाप करना चाहिए। ‘ऊँ त्रर्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात’।।मंगल ग्रह का संबंध भगवान शिव के त्रिशूल से है। गुरु ग्रह का संबंध भगवान शिव के डमरु की ध्वनि से है। चन्द्र ग्रह शिवजी के माथे पर विराजमान होकर अपनी आभा से जटाधारी शिव को प्रसन्न रखते हैं। कुण्डली में सप्तम भाव का कारक ग्रह शुक्र, शिव तथा शक्ति के सम्मिलित प्रयास से जीव सृष्टि का कारण बनता है। बाकी बचे सभी बुध आदि ग्रह समभाव रखने में सहायक होते हैं। इन सभी कारणों से शिव पूजन का अत्यधिक महत्व है।भगवान शिव को कई नामों से पुकारा जाता है। रुद्र-जो दुःखों का निर्माण तथा नाश दोनों ही करता है।पशुपतिनाथ-भगवान शिव पशु तथा पक्षियों और जीवात्माओं के स्वामी हैं।अर्धनारीश्वर-भगवान शिव का यह नाम शिव तथा शक्ति के मिलने से प्रचलित हुआ।महादेव-ईश्वर की महान शक्ति।भोले-भगवान शिव का ह्रदय कोमल है। वह दयालु हैं तथा बहुत जल्द प्रसन्न होकर सभी को क्षमा कर देते हैं। इसलिए इन्हें भोले कहा गया है।लिंगम-रोशनी की लौ है यह शब्द समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक है।नटराज-नृत्य के देवता।



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