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पोंगल (pongal)



                                   पोंगल

पोंगल का त्योहार दक्षिण भारत में मनाया जाता है । इस त्योहार का संबंध फसल से जुड़ा है। पोंगल का अर्थ है खिचड़ी। इस दिन दक्षिण भारत में नई फसल आने के उपलक्ष्य में खिचड़ी बनाई जाती है। पारम्परिक रुप से यह त्योहार फसल कटाई का उत्सव है। इस त्योहार का संबंध फसल से जुड़ा है इसलिए तीन दिन तक वर्षा, धूप तथा खेती में काम आने वाले मवेशियों (पशुओं) की पूजा की जाती हैं। इन तीनों के बिना खेती करना किसान के लिए असंभव कार्य है। पोंगल के त्योहार का इतिहास में प्राचीन काल से महत्व चला आ रहा है ।
दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इस त्योहार को चार दिन तक मनाया जाता है। लेकिन मुख्य रूप से इस त्योहार को तीन दिन तक ही मनाने की परम्परा है। 13 जनवरी से पोंगल के त्योहार का उत्सव आरम्भ हो जाता है और 14 जनवरी से एक दिन बाद तक पोंगल का उत्सव चलता हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस त्योहार में पोंगल के तीन अलग नाम होते हैं। भोगी पोंगल, सूर्य पोंगल और मात्तुपोंगल। कुछ भागों में चैथे दिन मनाने वाले पोंगल को कन्नु पोंगल के नाम से जाना जाता है ।
भोगी पोंगल 
पोंगल का पहला दिन भोगी पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन बारिश के देवता इन्द्र की पूजा की जाती है। एक अच्छी फसल के लिए पानी की आवश्यकता पड़ती है । बिना पानी के किसान अपनी फसल को लहलहाते हुए नहीं देख सकता। इसलिए इन्द्रदेव को प्रसन्न रखने के लिए उनकी पूजा की जाती है ताकि आने वाले समय में भगवान इन्द्र उन्हें आशीर्वाद दें और उनकी फसल की पैदावार पहले से अधिक हो।
इस दिन से दक्षिण भारत के नए कैलेण्डर की शुरुआत भी होती है। इस दिन सूर्योदय से पहले रात भर आग जलाई जाती है, जिसमें घर का फालतू सामान जला दिया जाता है। उसके बाद सुबह के समय घर की सारी साफ-सफाई करने के पश्चात घर के बाहर चावल के आटे से रंगोली बनाई जाती है, जिसे कोलम कहते हैं। इस रंगोली के मध्य में गाय के गोबर के गोले बनाकर रखे जाते हैं और गोबर के गोलों के बीच में पीले या लाल रंग के फूल सजाये जाते हैं।
सूर्य पोंगल 
पोंगल के दूसरे दिन को सूर्य पोंगल कहा जाता है। इस दिन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। एक अच्छी फसल के लिए धूप की आवश्यकता होती है, इसलिए सूर्य देव की आराधना इस दिन की जाती है। इस दिन सूर्य मकर संक्रान्ति में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है। इस दिन किसान अपने आँगन में एक हाँडी या पीतल के बर्तन में खिचड़ी पकाते हैं। हाँडी को आग पर चढ़ाने का भी एक मुहूर्त होता है। उस मुहूर्त के अनुसार ही खिचड़ी बनाई जाती है। उस बर्तन में एक हल्दी की जड़ की गाँठ को डालकर उसका एक सिरा बर्तन की गर्दन से बाँध देते हैं। बर्तन में चावल और मूँग की दाल की खिचड़ी पकाई जाती है। जब खिचड़ी में उफान आता है और वह बर्तन से बाहर आने लगती है तब उसमें घी तथा दूध डाला जाता है। उफान आने पर घर के सभी सदस्य बहुत खुश होते हैं। खिचड़ी में उफान का संबंध घर के सुख तथा समृद्धि से जोड़ा गया है। बर्तन या हाँडी से खिचड़ी का दूध बाहर गिरता है तब इसे समृद्धशाली खेती का प्रतीक माना जाता है। जिस बर्तन में पोंगल अर्थात खिचड़ी पकाई जाती है उसे ‘पोंगल पलाई’ कहते हैं। 
मात्तु पोंगल 
पोंगल का अगला दिन मात्तु पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन खेती में काम आने वाले पशुओं की पूजा की जाती है। जैसे गाय, बैल, साँड आदि। वर्तमान समय में अत्याधुनिक उपकरण होने के बाद भी अधिकतर किसान परम्परागत तरीके से ही खेती कर रहें हैंै। इसलिए इन किसानों के लिए अपने खेतिहर पशुओं का बहुत महत्व होता है। इन पशुओं के बिना किसानों के लिए खेती करना असंभव कार्य है। इसलिए पशुओं का महत्व समझते हुए किसान इनकी पूजा करता है।
पशुओं की पूजा के साथ-साथ इस दिन साँड़ो अथवा बैलों की लड़ाई और बैलों की दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। दक्षिण भारत में ऐसी मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है कि जिस घर में एक आक्रामक साँड होता है उस घर में मान प्रतिष्ठा बनी रहती है। इस दिन बैलों को बैलगाडि़यों में जोतकर दौड़ का आयोजन किया जाता है। जीतने वाले किसान को इनाम की रकम प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त बहुत से बैलों को एक साथ दौड़ाया जाता है और प्रथम आने वाले बैल के मालिक को इनाम मिलता है। इन सब प्रतिस्पर्धाओं के लिए किसान अपने बैलों तथा साँडों को साल भर प्रशिक्षण देते हैं।
कन्नु पोंगल 
कन्नु पोंगल का त्योहार दक्षिण भारत के कुछ भागों में चैथे दिन भी मनाया जाता है। इस दिन इसे कन्नु पोंगल का नाम दिया गया है। इस दिन परिवार के सदस्य तथा सगे संबंधी एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैंै। घर के बड़े सदस्य छोटे बच्चों को उपहार देते हैं। इस दिन मुख्य रुप से पक्षियों को भोजन डाला जाता हैं। कई लोग केले के पत्तों पर खिचड़ी बनाकर बाहर पक्षियों के खाने के लिए रख देते हैं।



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