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तिल दान से मिलेगी दुख दारिद्रय से मुक्ति



वर्ष 2016 में षटतिला एकादशी का व्रत 4 फरवरी, के दिन रखा जाएगा। हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस दिन तिलों का छः प्रकार से उपयोग किया जाता है। जैसे-तिल से स्नान करना, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन करना, तिल से तर्पण करना, तिल का भोजन करना और तिलों का दान करना। इसलिए इसे षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस दिन जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, उनके सभी पापों का नाश होता है। इसलिए माघ मास में पूरे माह व्यक्ति को अपनी समस्त इन्द्रियों पर काबू रखना चाहिए। काम, क्रोध, अहंकार, बुराई तथा चुगली का त्याग कर भगवान की शरण में जाना चाहिए। इससे मनुष्य के सभी पाप समाप्त हो जाएंगें तथा उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि पृथ्वी लोक पर मनुष्य अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों में फंसा रहता है, अन्य लोगों की चुगलियाँ करता है। ब्राह्मण हत्या, चोरी तथा अन्य बहुत से पाप कर्म करता है फिर भी उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। दालभ्य ऋषि ने पूछा कि मनुष्य कौन सा दान अथवा पुण्य कर्म करे जिससे उनके सभी पापों का नाश हो। तब पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि माघ मास लगते ही मनुष्य को सुबह स्नान आदि करके शुद्ध रहना चाहिए। अपनी समस्त इन्द्रियों को संयम में रखकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। व्यक्ति पुष्य नक्षत्र में तिल तथा कपास को गोबर में मिलाकर उसके 108 कण्डे बनाकर रख लें। माघ मास की षटतिला एकादशी को सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। व्रत करने का संकल्प करके भगवान विष्णु जी का ध्यान करना चाहिए। यदि व्रत आदि में किसी प्रकार की भूल हो जाए तब भगवान कृष्ण जी से क्षमा याचना करनी चाहिए। रात्रि में गोबर के 108 कंडों से हवन करना चाहिए। रात भर जागरण करके भगवान का भजन करना चाहिए। अगले दिन धूप-दीप और नैवेद्य से भगवान का भजन-पूजन करने के पश्चात खिचड़ी का भोग लगाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के पास पूजन की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है तब वह सौ सुपारियों से भगवान का पूजन कर सकता है तथा अध्र्यदान कर सकता है। अध्र्य देते समय इस मंत्र का उच्चारण करें- कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव।संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम।।नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । सुब्रह्मण्य नमस्तेस्तु महापुरुष पूर्वज।।गृहाणार्ध्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते। व्यक्ति इस प्रार्थना को ऐसे भी बोल सकते हैं कि हे प्रभु आप दीनो को शरण देने वाले हैं। संसार के सागर में फंसे हुए लोगों का उद्धार करने वाले हैं। हे पुंडरीकाक्ष! हे विश्वभावन! हे सुब्रह्मण्य! हे पूर्वज! हे जगत्पते! आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मी जी सहित मेरे दिए अर्ध्य को स्वीकार करें। इसके बाद ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा, छाता, जूते तथा वस्त्र देने चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि किसी व्यक्ति की सामर्थ्य है तब वह काली गाय का दान कर सकता है। जो भी षटतिला एकादशी के व्रत को करता है उसे तिलों से भरा घड़ा भी ब्राह्मण को दान करना चाहिए। जितने तिलों का दान वह करेगा उतने ही ह्जार वर्ष तक वह स्वर्गलोक में रहेगा।    षटतिला एकादशी व्रत कथा-प्राचीन काल में पृथ्वी लोक पर एक ब्राह्मणी रहती थी। वह हमेशा व्रत करती थी लेकिन किसी ब्राह्मण अथवा साधु को कभी दान आदि नहीं देती थी। एक बार उसने एक माह तक लगातार व्रत रखा। इससे उस ब्राह्मणी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था। तब भगवान विष्णु ने सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत रख कर अपना शरीर शुद्ध कर लिया है अतः इसे विष्णु लोक में स्थान तो मिल जाएगा परन्तु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे ब्राह्मणी की तृप्ति होना कठिन है। इसलिए भगवान विष्णु ने सोचा कि वह भिखारी का वेश धारण करके उस ब्राह्मणी के पास जाएंगें और उससे भिक्षा मांगेगे। यदि वह भिक्षा दे देती है तब उसकी तृप्ति अवश्य हो जाएगी और भगवान विष्णु भिखारी के वेश में पृथ्वी लोक पर उस ब्राह्मणी के पास गये और उससे भिक्षा माँगीे। ब्राह्मणी ने विष्णु जी से पूछा-महाराज किसलिए आए हो? विष्णु जी बोले मुझे भिक्षा चाहिए। यह सुनते ही उस ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक ढेला विष्णु जी के भिक्षापात्र में डाल दिया। विष्णु जी उस मिट्टी के ढेले को लेकर स्वर्गलोक में लौट आये।कुछ समय के बाद ब्राह्मणी ने अपना शरीर त्याग दिया और स्वर्ग लोक में आ गई। मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी। वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है। तब विष्णु जी ने उसे दान की महिमा का ज्ञान दिया ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का व्रत विधि-विधान से किया। इससे उसके समस्त पापों का नाश हो गया। वह सुंदर तथा रुपवति हो गई। अब उसका घर अन्नादि सभी प्रकार की वस्तुओं से भर गया।इस प्रकार सभी मनुष्यों को लालच का त्याग करना चाहिए। षटतिला एकादशी के दिन तिल के साथ अन्न इत्यादि का दान करना चाहिए। इससे मनुष्य का सौभाग्य बढ़ता है। कष्ट तथा दरिद्रता दूर होती है। विधिवत तरीके से व्रत रखने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होगी।



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