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गुरु गोबिंद सिंह (Guru govind singh)



हे हिन्दू धर्म के रक्षक - तुम्हे नमस्कार है

हे वीरता की साक्षातमूर्ति - तुम्हे नमस्कार है

हे त्याग और बलिदान पुरुष - तुम्हे नमस्कार है

जब-जब धर्म का हृास होकर अत्याचार, अन्याय, हिंसा और आतंक के कारण मानवता खतरे में होती है तब-तब भगवान दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करने के लिए इस भूतल पर अवतरित होते हैं। सिक्ख संत व दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी की कुर्बानियाँ समस्त सनातन धर्म कभी नही भूल पाएंगे जिस समय औरंगजेब जैसा जालिम बादशाह दिल्ली के तख्त पर बैठा हुआ था। उसके आतंक से लोगों को राहत देने के लिए तथा हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जिस महान पुरुष ने अपने शीश की कुर्बानी दी, ऐसे सिक्खों के नवें गुरु गुरु तेग बहादुर के घर में सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था। सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही उन्होंने अपने पुत्रों और खुद की कुर्बानी दी। उन्होंने सभी वर्गों को एक सूत्र में पिरो दिया जिससे सभी में जोश भर गया। युद्ध को क्षत्रियों तक सीमित न रखकर सभी वर्गों के लोगों को शामिल किया। बाबा बुडढ़ा ने गुरु हरगोविंद को ‘मीरी’ और ‘पीरी’ दो तलवारें पहनाई थीं। पहली आध्यात्मिकता की प्रतीक थी, तो दूसरी संसारिकता की। परदादा गुरु अर्जुनदेव की शहादत, दादागुरु हरगोविन्द द्वारा किए गए यद्धु , पिता गुरु तेगबहादुर की शहीदी, दो पुत्रों का चमकौर के युद्ध में शहीद होना दो पुत्रो को जिन्दा दिवार में चुनवा दिया जाना वीरता या वलिदान की विलक्षण मिशालें है .

खालसा पंथ: औरंगजेब सहित अन्य राजाओं के अत्याचार से तंग आकर गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को एकजुट करके एक नई धर्मशक्ति को जन्म दिया। उन्होंने सिख सैनिकों को सैनिक वेश में दीक्षित किया। 13 अप्रैल 1699 को वैशाखी वाले दिन गुरुजी ने केशगढ़ साहिब आनंदपुर में पंच पियारों द्वारा तैयार किया हुआ अमृत सबको पिलाकर खालसा को ऊर्जा दी। खालसा का मतलब है वह सिख जो गुरु से जुड़ा है। वह किसी का गुलाम नहीं है, वह पूर्ण स्वतंत्र है।

पाँच कंकार:

युद्ध की प्रत्येक स्थिति में सदा तैयार रहने के लिए उन्होंने सिखों के लिए पाँच ककार अनिवार्य घोषित किए, जिन्हें आज भी प्रत्येक सिख धारण करना अपना गौरव समझता है:-

1) केश: जिसे सभी गुरु और ऋषि-मुनि धारण करते आए थे।

2) कंघा: केशों को साफ करने के लिए।

3) कच्छा: स्फूर्ति के लिए।

4) कड़ा: नियम और संयम में रहने की चेतावनी देने के लिए।

5) कृपाण: आत्मरक्षा के लिए। वाहे गुरु जी का खालसा वाहे

गुरु जी की फतेह।



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