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काल भैरव जयंती (KAAL BHAIRAV JAYANTI)



भैरव का अर्थ होता है, भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला । भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है । भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं । देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है । इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है ।

भैरव का जन्म :- काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था । शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई । बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए-पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव । भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है । भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है । नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है ।

वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र रूप में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन ‘भैरव’ के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कामों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान ‘भैरव’ ही हैं।

तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं । वामकेश्वर तंत्र की योगिनीह्रदयदीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- ‘विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवो भैरवः।

भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव

है । तंत्रालोक की विवेक-टीका में भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है ।

श्री तत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं ‘भ’ अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है, भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिक सूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है । वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष, बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं । ‘र’ अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं । उनके वस्त्र लाल हैं । सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग, खेट (मूसल), अंकुश, गदा, पाश, शूल, वर तथा अभय धारण किए हुए हैं ।

‘व’ अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक के सामान श्वेत हैं । वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है । विकसित कमल पुष्प उनका आसन है । वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल, वर एवं अभय धारण करती हैं ।

पीड़ामुक्ति के लिए की जाती है भैरव-साधना शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीडि़त हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो आज के दिन भैरव जी का पूजन जरूर करवाना चाहिए । भैरव के जप, पाठ और हवन अनुष्ठान मृत्यु तुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं ।

RUDRA FORM OF LORD SHIVA

Kaal Bhairav Jayanti, also known as Maha Kala Bhairava Jayanthi or Kaal Bhairava Ashtami is believed to be the appearance day of Lord Kaal Bhairav, the fierce form of Lord Shiva. Bhairav Jayanti is Birthday of Lord Bhairav. Sri Bhairav is a manifestation of Lord Shiva in his Rudra form - the dreadful form, from which even death (Kaal) fears. The fast, undertaken on this day, is fruitful, believed to be a protection from direct and indirect obstacles in life. Bhairav's conveyance is a dog. On Bhairav Jayanti Lord Bhairav (Shiva) is worshipped in the temples. His carrier Dog is fed with milk, curd and sweets.Devotees gather in temples early morning to seek the blessings of Lord Bhairav.

Legend :- Once, there was a controversy between two Gods Brahma and Vishnu. The point of difference was as to who, of the two, is superior. To decide the issue, saints, rishis and sages were summoned, who after deliberations pronounced that in fact there is a special power, Brahma and Vishnu are forms of the same. Vishnu was satisfied but Brahma could not agree with the judgment of the jury. Lord Siva could not tolerate this defamation of the jury; he instantly appeared in the form of Bhairav and smashed the pride of Brahma.Legend has it that Lord Shiva cut the fifth head of Lord Brahma on this day and performed penance. In this form Shiva is believed to punish the sinners.

Customs and Celebrations :

This day and the fast thereon, in reverence to Sri Bhairav, who is kind to his devotees and saves them from the havoc of time (Kaal). Lord Bhairav devotees take morning bath and perform special pujas and homas. Dead ancestors are also remembered on the day and pujas are performed for them. Kalashtami, also known as Kal Bhairav Ashtami, is observed on the eighth day after full moon in traditional Hindu calendar. Kalashtami is dedicated to Lord Shiva. It is his Kal Bhairava form that is worshipped on the day. The most important Kalbhairav Jayanti, or Mahakaal Bhairav Ashtami, is observed in Margashirsha month (November - December) in traditional Hindu calendar – the day Kala Bhairav appeared on earth. Staunch Shiva devotees observe special prayers and rituals on all Kalashtamis in a year.This day is beneficial for Tantra puja, Protection puja, Kalsarpa puja, Black magic removing puja, Shakti puja. Pitra dosha nivarana puja, Sharddha. Kaal Bhairav is pleased with deep daan. Chant the following mantra while worshiping Kaal Bhairava 



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