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इस दिन सजी थी शिव की बरात-07 मार्च



 

शिवरात्रि का व्रत फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि व्रत को बालक, स्त्री, पुरुष और वृद्ध सभी कर सकते है। भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न होने वाला देवता कहा गया है। इस व्रत के दिन भगवान शिव के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में शिव भक्त आते है। सभी शिवालयों में महाशिवरात्रि के दिन बेल, धतूरा और दूध से अभिषेक किया जाता है। इस दिन देवों के देव भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था। इस खुशी में यह पर्व मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि व्रत करने से मोक्ष प्राप्ती, कल्याण होता है, सभी दुःखों, का अंत होता है, मनोकामना की पूर्ति होती है। साथ ही धन, सुख-सौभाग्य, की प्राप्ति होती है। 

भगवान शिव को नीलकण्ठ एवं विश्वनाथ नाम से भी जाना जाता है। भगवान भोलेनाथ का व्रत करने से व्यक्ति को धन के प्रति लोभ, मोह से मुक्ति मिलती है। बुद्धि निर्मल होती है। और जीवन सदकार्यो में लगता है।

शास्त्रों के अनुसार सूर्योस्त होने के बाद के 2 घंटे 24 मिनट कि अवधि प्रदोष काल कहलाती हे। प्रदोष काल के समय में भगवान शिव प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते है। प्रदोषकाल में ही शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। यही कारण है, कि प्रदोषकाल में शिव पूजा या शिवरात्रि में शिव जागरण करना विशेष कल्याणकारी कहा गया है। सभी 12 ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव भी प्रदोष काल महाशिवरात्रि तिथि में ही हुआ था। 

महाशिवरात्रि पर्व एक उत्सव के रुप में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश के कई राज्यों में मेलों का आयोजन किया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर लगने वाले मेलों में रंगारंग कार्यक्रमों के अलावा, लाखों की संख्य में कावंरिये भी शामिल होते है। शिव जयकारा लगाते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक किया जाता है। 

फाल्गुन का मेला खास अहमियत रखता है। माना जाता है, कि पांडवों ने इस दिन रुद्र महायज्ञ किया था। पूरे देश के लाखों श्रद्धालु इस जल चढ़ाते है। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिवभक्त अपने ईष्ट देव को मनाने में पूरी श्रद्वा से लगे होते है। मेलों में शिव भक्तों का विशेष जमावडा होता है। शिवरात्रि के दिन सभी शिवालयों में सैकडों घंटे और शंखनाद की आवाज दूर-दूर तक जाती है। इस दिन भोले को मनाने के लिये ऊँ नमः शिवायः मंत्र का जाप करना विशेष शुभ है।

यह शिव महोत्सव पूरे भारत में पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। शिवलिंग की पूजा फूल, बेलपत्र, धतूरा, आदि से की जाती है।

इस व्रत को करने के लिये अधिक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती है। इस दिन रुद्राभिषेक और यज्ञ कर सकते है नहीं तो भगवान भोलेनाथ श्रद्धा से चढ़ाये गये एक बेलपत्र से भी प्रसन्न हो जाते है।

इस व्रत को केवल प्रदोषनिशिथ काल में ही करना चाहिए। जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने में असमर्थ हो, उन्हें रात्रि के प्रारम्भ में तथा अर्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन जरूर करना चाहिए। अगर पूरे दिन भी व्रत न करें तो सांयकाल में भगवान शिव का पूजा-अर्चना करना शुभ रहता है।



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