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पितृपक्ष परिचय

इस बार 2017 में महालय, यानी पितृपक्ष की शुरूआत 6 सितम्बर से होकर 20 सितम्बर को समाप्ति होगी। इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष 7 तारीख से शुरू होकर चौदह दिन बाद 20 तारीख को खत्म हो जायेगा। एक तिथि कम होने से ये पखवाड़ा चौदह दिनों का ही है। लिहाजा प्रतिपदा और द्वितिया दोनों के श्राद्ध 7 तारीख को ही होंगे। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ही पितृपक्ष समझा जाता है। वास्तविकता में पितृपक्ष की शुरूआत आश्विन कृष्ण पक्ष की शुरूआत के एक दिन पहले, यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से ही हो जाती है। इस तरह सभी स्थितियां सामान्य होने पर यह पक्ष सोलह दिन का होता है, लेकिन ऐसा क्यों होता है? 

पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध उसी तिथि को किया जाता है, जिस तिथि को उनका स्वर्गवास हुआ हो। कृष्ण पक्ष में केवल प्रतिपदा से अमावस्या तक की तिथियां होती हैं तो अगर किसी का स्वर्गवास पूर्णिमा के दिन हुआ हो, तो उसका श्राद्ध कब करेंगे। इस समस्या के निवारण के लिये ही भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से महालय, यानी पितृपक्ष की शुरूआत का प्रावधान किया गया है।

परिचय-

 

हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का बहुत अधिक महत्व है। हिन्दू-धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद जीवात्मा को उसके कर्मानुसार स्वर्ग-नरक में स्थान मिलता है। पाप पुण्य क्षीर्ण होने पर वह पुनः मृत्यु लोक में आ जाती है। मृत्यु के पश्चात पितृयान मार्ग से पितृलोक में होती हुई चन्द्रलोक जाती है। चन्द्रलोक में अमृतान्त का सेवन करके निर्वाह करती है। यह अमृतान्त कृष्ण पक्ष में चन्द्रकलाओं के साथ क्षीर्ण पड़ने लगता है। अतः कृष्ण पक्ष मे वंशजों को आहार पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। श्राद्ध एवं पिण्डदान के माध्यम से पूर्वजों को आहार पहुंचाया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष में पितृतर्पण अवश्य करना चाहिए।

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।

आयुः पुत्रान्यशः स्वर्गंकीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।

पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।

देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।

देवताभ्यः पितृणां हिपूर्वमाप्यायनं शुभम्।। 

                                                                                                                          -गरूड़ पुराण

 (समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है।                                                                                                              

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श्राद्ध क्या होता है ?

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, जिसका मतलब है पितरों के प्रति श्रद्धा भाव। जैसे व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है, वैसे ही हिन्दू-धर्म को मानने वाला व्यक्ति माता-पिता की देहावसान के बाद भी उनको संतुष्ट करने का प्रयास करता है। हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं। यही ऋण उतारने के लिए श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना हमारा कर्तव्य है।

क्यों करते हैं श्राद्ध 

जब जीवात्मा पितृलोक जाती है तो उसे स्वयं शक्ति की आवश्यकता होती है। जिसकी पूर्ति हम पिंडदान द्वारा करते हैं। हम इन्हें उपयुक्त पदार्थों से पिंडदान करते हैं। इससे इन्हें नई ऊर्जा प्राप्त होती है और ये चंद्रमा से प्रयुक्त सामग्री- जौ, अक्षत, तिल, शहद, जल, गोदुग्ध, दही आदि। शास्त्रों में जल तर्पण का भी विशेष महत्व है।

दो प्रकार से करते हैं पितरों का श्राद्ध -  

1.  तिल अर्पण अर्थात् जल के साथ तिल मिलाकर पितरों के नाम से जल छोड़ना।

2.  दूसरे प्रकार का श्राद्ध हवन कर्म के साथ होता है। पितरों के लिए हवन कुंड में अन्न, घी आदि वस्तुएं मंत्रोच्चारण समेत डाली जाती है। इसे पर्वण श्राद्ध कहते है। इसी अवसर पर ब्राह्मणों को पितरों के नाम से भोजन कराया जाता है। वास्तव में यह पांच प्रकार का होता है।

(1) ब्रहम यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्देव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ

श्राद्ध पक्ष में कौवे का महत्व- 

कौवों को पितृ का प्रतीक माना जाता है। श्राद्ध के दिन भोजन में से कौवों के नाम का भी एक भाग निकाला जाता है। इन दिनों कौवों को खाना खिला कर पितरों को तृप्त किया जाता है। पितृ पक्ष के प्रथम दिन प्रथम न्योत, दूसरा पूर्वज की मृत्यु की तिथि पर, तीसरा आमंत्रण नवमी तिथि और अंतिम बार पितृ विसर्जन के दिन पक्षियों को आमंत्रित कर भोजन कराने की सदियों से परम्परा चली आ रही है। 

श्राद्ध करने की विधि - 

सुबह ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके देवस्थान व पितृस्थान को गाय के गोबर से लीप कर व गंगा जल से पवित्र करने के बाद महिलायें शुद्ध होकर पुर्वजों की रूचि के अनुसार भोजन बनायें। श्राद्ध करने वाला ब्राह्मणों को आंमत्रित करने जाये। पितरों के निमित्त ब्राह्मणों की आज्ञा से अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर की आहुतियां दे। इसके बाद गाय, कुत्ता और कौओं के लिए अन्न निकाल कर ब्राह्मणों के पात्र में परोसें और श्रद्धा पूर्वक भोजन करायें। इसके पश्चात ऋण वेदोक्त रक्षोन्ध मंत्र ‘’ऊँ अवहता असुरा रक्षांसि वेदिषद’’ इत्यादि ऋचा का पाठ करें और श्राद्ध भूमि पर तिल छिड़के तथा अपने पितृ-रूप में उन ब्राह्मणों का चितंन करें और उनसे निवेदन करें कि मेरे पूर्वजों को आज तृप्ति मिले।

श्राद्ध में ध्यान रखने योग्य बात – 

1.   श्राद्ध कर्म में ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए |

2.   श्राद्ध कर्म में गाय का घी और दूध काम में लेना चाहिए।

3.    श्राद्ध कर्म के समय यदि कोई भी आ जाये तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए|

4.    जो व्यक्ति पितरों का श्राद्ध करता है, उसे पितृपक्ष में बह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

5.    श्राद्ध एवं तर्पण में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए।

6.    पितृपक्ष में दरवाजे पर आने वाले किसी भी जीव का निरादर नहीं करना चाहिए।

7.    पितृपक्ष के दौरान मास मछली नहीं खानी चाहिए।

8.    पितृपक्ष में चना, मसूर, सरसों का साग और बासी भोजन नहीं करना चाहिए।

9.    जिनके माता-पिता का देहावसान हो गया है उन लोगों को पितृपक्ष में नये वस्त्रों खरीदने और पहनने नही चाहिए।

10.   कुर्म पुराण के अनुसार श्राद्ध में किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं बुलाना चहिए जो मित्र, गुरू या शिष्य हो।

11.   श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही खाना चाहिए

श्राद्ध योग्य तिथियां

पूर्णिमा- इस दिन से ही श्राद्ध पक्ष का आरंभ होता है। जिस भी व्यक्ति की मृत्यु प्रतिपदा तिथि को शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष के दिन होती है, उनका श्राद्ध किया जाता है।

प्रतिपदा- इस दिन नाना पक्ष के सदस्यों का श्राद्ध किया जाता है।

द्वितीया- जिस भी व्यक्ति की मृत्यु शुक्ल या कृष्ण पक्ष के द्वितीया तिथि को होती है, उनका श्राद्ध पितृपक्ष की द्वितिया तिथि को होता है।

तृतीया- इसे महाभरणी भी कहते हैं। जिस व्यक्ति की मृत्यु तृतीया तिथि को हुई हो, इस दिन उनका श्राद्ध होता है। भरणी श्राद्ध को गया में किये गए श्राद्ध के तुल्य माना जाता है। क्योंकि भरणी नक्षण के स्वामी यमराज होते हैं और यमराज स्वयं मृत्यु के देवता हैं।

पंचमी तिथिः- इस दिन ऐसे व्यक्तियों का श्राद्ध किया जाता है जिनका देहांत अविवाहित अवस्था में हो गया हो।

नवमी तिथिः- इस दिन सौभाग्यवती स्त्री, जिसकी मृत्यु उसके पति से पूर्व हो गई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है। इस दिन माता का श्राद्ध करने का भी महत्व है। इसलिए इसे मातृ नवमी भी कहते हैं।

एकादशी व द्वादशी- इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध करना उत्तम माना गया है, जिन्होंने सन्यास ले लिया हो।

चतुर्दशी- इस तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है, जिन लोगों की अकाल मृत्यु हो गई हो।

सर्वपितृमोक्ष अमावस्याः- श्राद्ध कर्म के लिये यह सबसे उत्तम तिथि है। जिन लोगों को अपने पित्तर की तिथि ज्ञात ना हो वो इस दिन पित्तरों का श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। 

(वायु पुराण के अनुसार रात्रि के समय श्राद्ध कर्म करने चाहिए |)

 

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तर्पण का महत्व

  

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जिस प्रकार वर्षा का जल सीप में गिरने से मोती, कदली में गिरने से कपूर, खेत में गिरने से अन्न और धूल में गिरने से कीचड़ बन जाता है। उसी प्रकार तर्पण के जल से सूक्ष्म वाष्पकण देव योनि के पितर को अमृत, मनुष्य योनि के पितर को चारा व अन्य योनियों के पितरों को उनके अनुरूप भोजन व सन्तुष्टि प्रदान करते हैं। शास्त्रानुसार कृष्ण पक्ष पितृ पूजन व शुक्ल पक्ष देव पूजन के लिए उत्तम है।

तर्पण कर्म के प्रकार 

ये 6 प्रकार के होते हैं।

(1) देव-तर्पण (2) ऋषि तर्पण (3) दिव्य मानव तर्पण (4) दिव्य पितृ-तर्पण (5) यम तर्पण (6) मनुष्य-पितृ तर्पण।

 

पितृ तीर्थ मुद्रा में कैसे करें तर्पण –

 

जल  में जौ, चावल, और गंगा जल मिलाकर तर्पण कार्य किया जाता है। पितरों का तर्पण करते समय पात्र में जल लेकर दक्षिण दिशा में मुख करके बाया घुटना मोड़कर बैठते हैं और जनेऊ को बाये कंधे से उठाकर दाहिने कंधे पर रख लेते हैं। इसके बाद दाहिने हाथ के अंगूठे के सहारे से जल गिराते हैं। इस मुद्रा को पितृ तीर्थ मुद्रा कहते हैं। इसी मुद्रा में रहकर अपने सभी पित्तरों को तीन-तीन अंजलि जल देते हैं।

पिण्ड का अर्थ 

श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके जो पिण्ड बनाते हैं, उसे सपिण्डीकरण कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर।

यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र उपस्थित होते हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बांटते हैं। जिन-जिन लोगों के गुणसूत्र (जीन्स) आपकी देह में हैं, उन सबकी तृप्ति के लिये यह अनुष्ठान किया जाता है।

 

 

 

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श्राद्ध स्थल और तीर्थ- 

समुद्र और समुद्र में गिरने वाली नदी के तट पर, गौशाला में जहां बैल न हों, नदी संगम पर, उच्च गिरिशिखर पर, लीपी-पुती स्वच्छ एवं मनोहर भूमि पर, गोबर से लीपे हुए एकांत घट में नित्य ही विधिपूर्वक श्राद्ध करने से मनोरथ पूर्ण होते हैं।

तीर्थ स्थानों पर सविधि पिण्ड दान व तर्पण करने के लिए पितृ क्षेत्रों को पुराणों के अनुसार पांच भागों में बंटा गया है।

1.    बोधगया (फल्गू नदी के किनारे)

2.    नाभिगया या वैतरणी (उड़ीसा)

3.    पदगया या पीठापुर

4.     मातृगया या सिद्धपुरव

5.    ब्रह्म कपाली या बद्रीनाथ



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