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सामाजिक सौहार्द का पर्व है ‘लोहड़ी’

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लोहड़ी मुख्यत: पंजाब का पर्व है लेकिन यह त्योहार पूरे उत्तर भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार लोहड़ी जनवरी महीने में मकर संक्रान्ति से एक दिन पहले मनाई जाती है। इस समय धरती सूर्य से अपने सुदूर बिन्दु से फिर दोबारा सूर्य की ओर मुख करना प्रारम्भ कर देती है। यह साल का सबसे ठंडा महीना होता है। पौष मास समाप्त होता है तथा माघ महीने के शुभारम्भ उत्तरायण काल ( 14 जनवरी से 14  जुलाई ) का संकेत देता है। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपना विराट व अत्यन्त ओजस्वी स्वरूप इसी काल में प्रकट किया था। हिन्दू इस अवसर पर गंगा में स्नान कर अपने सभी पाप त्यागते हैं। गंगासागर में इन दिनों स्नानार्थियों की अपार भीड़ उमड़ती है। उत्तरायणकाल की महत्ता का वर्णन हमारे शास्त्रकारों ने अनेक ग्रन्थों में किया है। लोहड़ी में मूंगफली, तिल, गुड़ और गजक का विशेष महत्व है। मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला यह त्योहार, समाज के विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों में मिठास का प्रतीक बन गया है।

किंवदन्तियां

दरअसल लोहड़ी खुशियां बांटने का त्योहार है। लोहड़ी अलग-अलग जगह अलग-अलग रीतियों से मनाई जाती है और उन रीति रिवाजों से अनेक प्रागैतिहासिक कहानियां जुड़ी हुई हैं। उन कहानियों में सबसे रोचक दुल्ला भट्टी की है। 1547  में पैदा हुए राय अब्दुल्ला खान जिन्हें दुनिया दुल्ला भट्टी पुकारती है, एक राजपूत मुसलमान थे। बताया जाता है कि उनके पैदा होने के चार महीने पहले ही उनके दादा और पिता को हुमायूं ने मरवा दिया था। दुल्ला भट्टी उस जमाने का रॉबिनहुड था जो अमीरों से धन लूटकर गरीबों में बांटा करता था। अकबर दुल्ला भट्टी से बहुत डरता था। कहा तो ये भी जाता है कि दुल्ला भट्टी के चलते ही अकबर को अपनी राजधानी आगरा से लाहोर शिफ्ट करनी पड़ी थी। उस दौर में मुगल सरदारों का आतंक था। किसान सुंदरदास के दो बेटियां थीं सुंदरी और मुंदरी। मुगल सरदार उन लड़कियों को जबरदस्ती सुंदरदास से खरीदना चाहते थे। दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों को मुगल सरदारों से बचाया। खुद मुसलमान होते हुए भी दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों की शादी हिन्दू लड़कों से करवाई और शगुन में शक्कर भी दी। दुल्ला भट्टी ने मुगल सरदारों के खेत जलवा दिए इसलिए लोहड़ी की रात को आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है। आग रिश्तों में गरमाहट का काम करती है जिसमें लोग गेहूं की बालियां डालकर गाते हुए त्योहार का लुत्फ लेते हैं। लोहड़ी के गाने दुल्ला भट्टी को केन्द्र में रखकर ही लिखे गए हैं। लोहड़ी के दिन ‘सुंदरिए मुंदरिए होय, तेरा कौन विचारा होय, दूल्ला भट्टी वाला होय…’ गाने को गाकर मानवता का संदेश दिया जाता है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रजापति दक्ष के यज्ञ की आग में कूदकर शिव की पत्नी सती ने आत्मदाह कर लिया था। सती के त्याग के रूप में इस त्योहार को मनाये जाने की परम्परा है।लोहड़ी के मौके पर नई फसल काटी जाती है। गेहूं के आटे से लोहे के तवे पर रोटियां सेकीं जाती है  इसलिए कई स्थानों पर लोहड़ी को ‘लोह’ भी कहा जाता है। लोहड़ी का पर्व पंजाबियों के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि लोहड़ी के अगले दिन से ‘पंजाबी न्यू ईयर’ की शुरुआत मानी जाती है।

मानवता और सामाजिक सौहार्द को स्थापित करने का दिन

लोहड़ी का सीधा-सीधा संबंध मौसम और फसल से है। इस दिन से मूली और गन्ने की फसल बोई जाती है। इससे पहले रबी की फसल काटकर घर में रख ली जाती है। खेतों में सरसों के फूल लहलहाते दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर लोहड़ी नयेपन, ताजगी, मौसम परिवर्तन और प्रकृति का त्योहार है जिससे जुड़ी किंवदन्तियों से हमें प्रेरणा भी मिलती है। दुल्ला भट्टी की मान्यता भी हमें सामाजिक सौहार्द और धर्म से ऊपर मानवता को स्थापित करने की सीख देती है। भारत के अन्य भागों में लोहड़ी के दिन को पोंगल और मकर संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है।
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Tags : Festivallohri

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