Rahukaal Today/ 21 April 2017 (Delhi)-27 April 2017

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Ekadashi
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साल के एकादशी व्रत एवं कथाएं

कामदा एकादशी - चैत्र मास
कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम है | इस व्रत को करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है | और समस्त कार्य सिद्ध हो जाते हैं |
कामदा एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन काल में 'नागलोक' में राजा पुण्डरीक राज्य करता था | उस विलासी की सभा में अप्सराएँ, किन्नर, गन्धर्व नृत्य किया करते थे | एक बार ललित नामक गंधर्व जब उसकी राज्यसभा में नृत्य - गान कर रहा था | सहसा उसे अपनी सुंदरी पत्नी की याद आ गई जिसके कारण उसके नृत्य, गीत लयवादिता में अरोचकता आ गई | कर्कट नामक नाग यह बात जान गया तथा राजा से कह सुनाया | इस पर क्रोधित होकर पुण्डरिक नागराज ने ललित को राक्षस हो जाने का शाप दे दिया | ललित सहस्त्रों वर्ष तक राक्षस योनि में अनेक लोकों में घूमता रहा इतना ही नहीं उसकी सहधर्मिणी ललिता भी उन्मतवेश में उसी का अनुसरण करती रही | एक समय वे दोनों शापित - दम्पति विन्ध्याचल पर्वत के शिखर पर स्थित श्रृंगी नामक मुनि के आश्रम में पहुंचे उनकी ये अवस्था देखकर मुनि को दया आ गई | और उन्होंने चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा | मुनि के बताये हुए नियमो को इन लोगो ने पालन किया | और एकादशी व्रत के प्रभाव से इनका श्राप मिट गया | दिव्य शरीर को प्राप्त कर वे दोनों स्वर्ग लोक को चले गए |                       

बरुथिनी एकादशी- वैशाख मास
यह वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है | यह व्रत सुख - शांति एवं सौभाग्य का प्रतीक होता है | यह व्रत किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देने, करोड़ो वर्ष तक तपस्या करने, तथा कन्यादान के भी फल से बढ़कर बरुथिनी एकादशी का व्रत होता है | इस व्रत का पालन करने वालों के लिए मुख्य रूप से इस दिन व्यंग खाना, दातुन फाड़ना, दूसरों की निंदा करना, क्रोध करना, और असत्य बोलना वर्जित होता है | इस व्रत की पूरी प्रक्रिया में तेल से युक्त भोजन नहीं करना चाहिए | इसकी महात्य्म्य सुनने से सहस्त्र गुरुओं की हत्या का भी दोष नष्ट हो जाता है | इस प्रकार यह बहुत ही फलदायक व्रत माना जाता है |
बरुथिनी एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मांधाता नामक राजा राज्य - सुख भोग रहा था | राजकाज करते हुए भी वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी था | एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा | थोड़ी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया | तब राजा ने घबराकर तापस धर्म के अनुकूल हिंसा, क्रोध न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की | उसी समय भक्तवत्सल भगवान प्रकट हुए तथा भालू को चक्र से मार डाला | राजा का पैर भालू खा चुका था इससे वह बहुत ही शोकाकुल हुआ | विष्णु भगवान ने उसको दुखी देखकर कहा - हे वत्स ! मथुरा में जाकर तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरुथिनी एकादशी का व्रत रहकर करो | उसके प्रभाव से तुम पुन: अंगो वाले हो जाओगे | भालू ने जो तुम्हे काटा है यह तुम्हारा पूर्वजन्म का अपराध था | राजा ने इस व्रत को अपार श्रद्धा से किया तथा सुन्दर अंगो वाला हो गया |

मोहिनी एकादशी - वैशाख मास
यह वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी होती है | इसी दिन भगवान पुरुषोत्तम ( राम ) की पूजा का विधान है | भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कराकर श्वेत वस्त्र पहनना चाहिए | उच्चासन पर बैठा कर धूप, दीप से आरती उतारते हुए मीठे फलों से भोग लगाना चाहिए | प्रसाद वितरित कर ब्राह्मण को भोजन तथा दान - दक्षिणा देनी चाहिए | रात्रि में भगवान का कीर्तन करते हुए मूर्ती के समीप ही शयन करना चाहिए | एकादशी व्रत के प्रभाव से निंदिंत कार्यों से छुटकारा मिल जाता है |
मोहिनी एकादशी व्रत की कथा
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की नगरी थी | उसमे धृतनाभ राजा राज्य करता था | उसके राज्य में एक धनवान वैश्य रहता था | वह बड़ा धर्मात्मा और विष्णु का भक्त था | उसके पांच पुत्र थे | बड़ा पुत्र महापापी था | जुआ खेलना, मद्दपान करना, परस्त्री गमन, वेश्याओं का संग आदि नीच काम करने वाला था | उसके माता - पिता ने उसे कुछ धन वस्त्राभूषण देकर घर से निकाल दिया | आभूषणों को बेचकर उसने कुछ दिन काट लिया अंत में धन हीन हो गया और चोरी करने लगा | पुलिस ने उसको पकड़ कर बंद कर दिया | दंडअवधि व्यतीत हुई तो नगर से निकाला गया | वह वन में पशु पक्षियों को मारता तथा खाकर अपना गुजारा करता | एक दिन उसके हाँथ शिकार न लगा भूखा - प्यासा वह कौडिन्यमुनि  के आश्रम पर आया और हाँथ जोड़कर बोला मै आपकी शरण में हूँ मै प्रसिद्ध पातकी  हूँ | मुझे कोई उपाय बता कर मेरा कल्याण कीजिये | मुनि जी बोले वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करो अनंत जन्मो के पाप भष्म हो जायेंगे | मुनि की शिक्षा से वैश्य कुमार ने मोहिनी एकादशी का व्रत किया | पाप रहित होकर विष्णु लोक को चला गया | इसका महात्यम्य सुनने से हजारो गौदान का फल मिलता है |                                         

अचला एकादशी - ज्येष्ठ मॉस  
ज्येष्ठ मॉस की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी कहते हैं | इसे अपरा एकादशी भी कहते हैं | इस व्रत के करने से ब्रह्महत्या, परनिन्दा, भूत योनी जैसे निकृष्ट कर्मो से छुटकारा मिल जाता है | तथा कीर्ति, पुन्य एवं धन - धान्य में अभी वृद्धि होती है |
अचला एकादशी की कथा -
प्राचीन काल में महिध्वज नामक धर्मात्मा राजा राज्य करता था | विधि की विडंबना देखिये की उसी का छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था | वह अपने बड़े भाई को अपना बैरी समझता था | उसने एक दिन अवसर पाकर अपने बड़े भाई राजा महिध्वज की हत्या कर दी और उसके मृत शरीर को जंगल में पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया | राजा की आत्मा पीपल पर निवास करने लगी और आने जाने वाले लोगो को सताने लगी | अचानक एक दिन धौम्य ऋषि उधर से निकले उन्होंने तपोबल से प्रेत के उत्पात का कारण तथा उसके जीवन वृत्तांत को समझ लिया | ऋषि महोदय ने प्रसन्न होकर प्रेत को पीपल के वृक्ष से उतारकर परलोक विद्या का उपदेश दिया | अंत में ऋषि ने प्रेत योनि से मुक्ति पाने के लिए अचला एकादशी व्रत करने को कहा | अचला एकादशी व्रत करने से राजा दिव्य शरीर धारण कर स्वर्गलोक  को चला गया |

निर्जला एकादशी - ज्येष्ठ मास
जेठ सुदी एकादशी (ग्यारस ) को निर्जला एकादशी होती है एकादशी के दिन सबको निर्जला एकादशी का व्रत करना चाहिए | जल भी नहीं पीना चाहिए | यदि बिना खाए न रहा जाए तो फलाहार लेकर व्रत करें | एकादशी के दिन सब मटके में जल भरकर उसे ढक्कन से ढक दें और ढक्कन में चीनी व दक्षिणा, फल आदि रखें | जिस ब्राह्मण को मटका दें उसी ब्राह्मण को एकादशी के दिन एक - एक सीधा और शरबत भी दें | मेहँदी लगाकर, नथ पहनकर, ओढ़नी ओढ़कर सबको एकादशी के दिन बायना निकालना चाहिए | एक मिट्टी के मटके में जल भरकर ढक्कन में चीनी, रुपया रखो | बायने के साथ आम रखकर और करवे पर रोली से सतिया बनाकर ढक्कन से ढक दो फिर हाथ फेरकर सासूजी के पैर छूकर दे दो |
निर्जला एकादशी व्रत की कथा -
एक समय की बात है कि भीमसेन ने व्यासजी से कहा '' भगवन ! युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुंती तथा द्रौपदी सभी एकादशी के दिन उपवास करते हैं तथा मुझसे भी यह करने को कहते है | मै कहता हूँ कि मै भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता | मै दान देकर तथा वासु देव भगवान् कि अर्चना करके उन्हें प्रसन्न कर लूँगा | बिना व्रत किये जिस तरह से हो सके, मुझे एकादशी व्रत का फल बताइए, मै बिना काया - क्लेश के ही फल चाहता हूँ ''
इस पर वेड व्यास बोले - भीमसेन ! यदि तुम्हे स्वर्ग लोक प्रिय है तथा नरक से सुरक्षित रहना चाहते हो तो दोनों एकादशियों का व्रत रखना होगा | भीमसेन बोले - हे देव एक समय भोजन करने से तो मेरा  काम न चल सकेगा मेरे उदर में वृक नामक अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती है | पर्याप्त भोजन करने पर भी मेरी क्षुधा शांत नहीं होती है | हे ऋषिवर आप कृपा करके मुझे ऐसा व्रत बताइये कि जिसके करने मात्र से मेरा कल्याण हो सके |
व्यास जी बोले - भद्र ! जेष्ठ कि एकादशी को निर्जल व्रत कीजिये | स्नान, आचमन में जल ग्रहण कर सकते हैं, अन्न बिलकुल भी न ग्रहण कीजिये | अन्न का आहार लेने से व्रत खंडित हो जाता है | तुम भी जीवन पर्यन्त इस व्रत का पालन करो | इससे तुम्हारे पूर्वकृत एकादशियों के अन्न खाने का पाप समूल विनष्ट हो जाएगा | इस दिन '' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'' मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए एवं गौ दान करनी चाहिए | व्यास कि आज्ञानुसार भीमसेन ने बड़े साहस के साथ निर्जला का यह व्रत किया, जिसके परिणामस्वरुप प्रात: होते - होते संज्ञाहीन हो गयें | तब पांडव ने गंगाजल, तुलसी, चरणामृत, प्रसाद देकर उनकी मूर्छा दूर कि | तभी से भीम सेन पापमुक्त हो गए |

योगिनी एकादशी - आषाढ़ मॉस
यह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है | इस दिन व्रत रखकर भगवान नारायण की मूर्ती को स्नान कराके भोग लगाते हुए पुष्प, धूप, दीप से आरती उतारनी चाहिए | गरीब ब्राह्मणों को दान देना परम श्रेयस्कर है | इस एकादशी के प्रभाव से पीपल का वृक्ष काटने से उत्त्पन्न पाप नष्ट हो जाते हैं | और अंत में स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है |
योगिनी एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन समय की बात है | अल्कापुरी में कुबेर के यहाँ एक हेम नामक माली रहता था | वह भगवान शंकर की पूजा के लिए नित्यप्रति मानसरोवर से फूल लाया करता था | एक दिन वह कामोन्मत्त होकर अपनी स्त्री के साथ स्वछंद विहार करने के कारण फूल लाने में प्रमाद कर बैठा तथा कुबेर के दरबार में विलम्ब से पहुंचा | क्रोधी कुबेर के शाप से वह कोढ़ी हो गया | कोढ़ी के रूप में जब वह मार्कन्डेय ऋषि के पास पहुंचा तब उन्होंने योगिनी एकादशी व्रत रखने का नियम बताया | व्रत के प्रभाव से उसका कोढ़ समाप्त हो गया तथा दिव्य शरीर प्राप्त करके स्वर्गलोक को गया |

देवशयनी एकादशी - आषाढ़ मॉस
आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को देव सोते हैं इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं | बाद में कार्तिक सुदी एकादशी को देव उठते हैं आषाढ़ की इस एकादशी को व्रत करना चाहिए | भगवान का नया बिछौना बिछा कर भगवान को सजाओ, और जागरण करके पूजा करनी चाहिए |
देवशयनी एकादशी व्रत की कथा -
सूर्यवंश में मान्धाता नामक प्रसिद्ध सत्यवादी राजा अयोध्यापुरी में राज्य करता था | एक समय उसके राज्य में अकाल पड़ गया | प्रजा दुखी होकर भूखों मरने लगी | हवन आदि शुभ कार्य बंद हो गए | राजा को कष्ट हुआ इसी चिंता में  वह वन को चल पड़ा | और अंगिरा ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा और ऋषि से बोला - हे सप्तऋषियों में श्रेष्ठ अन्गिराजी मै आपकी शरण में आया हूँ बात यह है कि मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है, प्रजा कहती है राजा के पापो से प्रजा को दुःख मिलता है | मैंने अपने जीवन में किसी प्रकार का कोई पाप नहीं किया | आप दिव्य दृष्टि से देखकर कहो कि अकाल पड़ने का क्या कारण है |
अंगिरा ऋषि बोले - सतयुग में ब्राह्मणों का वेद पढ़ना और तपस्या करना धर्म है परन्तु आपके राज्य में आजकल एक शूद्र तपस्या कर रहा है | शूद्र को मारने से दोष दूर हो जाएगा,  और प्रजा को सुख मिलेगा | मान्धाता बोले - मै उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को नहीं मारूंगा | आप इस कष्ट से छूटने का कोई और सुगम उपाय बताइये | ऋषि बोले कि मै सुगम उपाय कहता हूँ, भोग तथा मोक्ष देने वाली देवशयनी एकादशी है | इसका विधि पूर्वक व्रत करो | उसके प्रभाव से चातुर्मास तक वर्षा होती रहेगी | इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला तथा उपद्रवो को शांत करने वाला है | मुनि कि शिक्षा से मान्धाता ने प्रजा सहित पदमा एकादशी का व्रत किया और कष्ट से छूट गया | इसका माहात्यम्य पढ़ने या सुनने से अकाल म्रत्यु के भय दूर हो जाते हैं | आज के दिन तुलसी का बीज पृथ्वी या गमले में बोया जाए तो महापुण्य होता है | तुलसी के वमन से यमदूत भय खाते हैं | जिनका कंठ तुलसी माला से सुशोभित हो उनका जीवन धन्य समझना चाहिए |

कमिका एकादशी - श्रावण मॉस
यह सावन के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है | इसे पवित्रा के नाम से भी पुकारा जाता है | प्रात: स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत में स्नान कराके भोग लगाना चाहिए | आचमन के पश्चात धूप, दीप, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थो से आरती उतारनी चाहिए |
कामिका एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन काल में किसी गाँव में एक ठाकुर रहते थे | क्रोधी ठाकुर की एक ब्राह्मण से लड़ाई ही गई | उसके परिणामस्वरुप ब्राह्मण मारा गया | इस पर उन्होंने उसकी तेरहवीं करनी चाही मगर सब ब्राह्मणों ने भोजन करने से इनकार कर दिया | तब उन्होंने सभी ब्राह्मणों से निवेदन किया की हे भगवान् ! मेरा पाप कैसे दूर हो सकता है ? इस प्रार्थना पर उन सबने उसे एकादशी व्रत करने की सलाह दी ठाकुर ने वैसा ही किया | रात्रि में भगवान् की मूर्ति के पास जब वह शयन कर रहा था | तभी एक सपना आया और सपने में भगवान ने कहा हे ठाकुर तेरा पाप दूर गया | अब तू ब्राह्मण की तेरहवीं कर सकता है | तेरे घर सूतक नष्ट हो गया | ठाकुर तेरहवीं करके ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो विष्णु लोक गया |

पुत्रदा एकादशी - श्रावण मॉस
यह एकादशी सावन शुक्ल पक्ष में पुत्रदा एकादशी के नाम से मनाई जाती है | इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पुजन करना चाहिए उसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराके दान देकर आशीर्वाद लेना चाहिए | सारा दिन भगवान की वंदना - कीर्तन में बितावें तथा रात्रि में भगवान की मूर्ती के पास ही सोना चाहिए | इस व्रत को रखने वाले निः संतान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है |
पुत्र एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन समय में महिष्मति नगरी में महिजीत नामक राजा राज्य करते थे अत्यंत धर्मात्मा, शान्ति प्रिय तथा दानी होने पर भी उनके कोई संतान नहीं थी | इसी कारन राजा बहुत दुखी थे | एक बार राजा ने अपने राज्य के समस्त ऋषियों को बुलाया तथा संतान प्राप्ति का उपाय पुछा | इस पर परम ज्ञानी लोमश ऋषि ने बताया कि आपने पिछले जन्म में सावन की एकादशी को आपने अपने तालाब से प्यासी गाय को पानी पीने से हटा दिया था | उसी के शाप से आपके कोई संतान नहीं हो रही है | इसलिए आप सावन मॉस कि पुत्रदा एकादशी का नियमपूर्वक व्रत रखिये तथा रात्रि जागरण कीजिये, आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा | ऋषि कि आज्ञानुसार राजा एकादशी का व्रत रहा और फिर क्या उसको पुत्र रत्न कि प्राप्ति हुई |

अजा ( प्रबोधिनी) एकादशी - भाद्रपद मॉस
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी प्रबोधिनी, जया, कामिनी तथा अजा नाम से विख्यात है | इस दिन भगवान विष्णु जी की पूजा की जाती है | रात्री जागरण तथा व्रत रखने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं |
अजा एकादशी की कथा -
पुराणों में वर्णन आता है कि एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया | अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में पहुंचे तो राजा ने उन्हें अपना सारा राज्य सौंप दिया | ऋषि ने उनसे दक्षिणा कि पांच सौ स्वर्ण मुद्राएँ और मांगी | दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी एवं पुत्र तथा स्वयं को बेचना पड़ा | राजा हरिश्चन्द्र को एक डोम ने खरीदा था | डोम ने
राजा हरिश्चन्द्र को शमशान में नियुक्त करके मृतकों के सम्बन्धियों से कर लेकर शवदाह करने का कार्य सौपा था | उनको जब यह कार्य करते हुए कई वर्ष बीत गए तो एक दिन अचानक उनकी गौतम ऋषि से भेंट हो गई | राजा ने उनसे अपने ऊपर बीती सब बाते बताई तो मुनि ने उन्हें इसी अजा एकादशी का व्रत करने कि सलाह दी | राजा ने यह व्रत करना आरम्भ कर दिया | इसी बीच उनके पुत्र रोहिताश का सर्प के डसने से स्वर्गवास हो गया | जब उसकी माता अपने पुत्र को अंतिम संस्कार हेतु शमशान पर लायी तो राजा हरिश्चन्द्र ने उससे शमशान का कर माँगा | परन्तु उसके पास शमशान का कर चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था | उसने चुंदरी का आधा भाग देकर शमशान का कर चुकाया | तत्काल आकाश में बिजली चमकी और प्रभु प्रकट होकर बोले - महाराज तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है | तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है | तुम इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के नाम से अमर रहोगे | भगवान कि कृपा से रोहित जीवित हो गया | तीनो प्राणी चीर काल तक सुख भोगकर अंत में स्वर्ग चले गये |

परिवर्तनी एकादशी - भाद्रपद मॉस
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को पदमा एकादशी भी कहते हैं | यह श्री लक्ष्मी जी का परम आहलाद्कारी व्रत है | इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशय्या पर शयन करते हुए करवट बदलते हैं | इसीलिए इसे कर्वतनी एकादशी भी कहा जाता है | इस दिन लक्ष्मी - पूजा करना श्रेष्ठ है, क्योंकि देवताओं ने अपने पुन: राज्य को पाने के लिए महालक्ष्मी का ही पूजन किया था |
परिवर्तनी एकादशी की कथा -
त्रेता युग में प्रहलाद का पौत्र राजा बलि राज्य करता था | वह ब्राह्मणों का सेवक तथा भगवान विष्णु का भक्त था और इन्द्रादि देवताओं का शत्रु था | अपने भुजबल से देवताओं पर विजय प्राप्त करके उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया | देवताओं को दुखी देखकर भगवान ने बामन अंगुल का शरीर धारण किया और बलि के द्वार पर आकर कहा - मुझे तीन पग पृथ्वी का दान चाहिए | बलि राजा बोले - तीन लोक दे सकता हूँ, विराट रूप धारण करके नाप लो | बामन भगवान ने विराट रूप धारण करके दो पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया, तीसरा पग उठाया तो बलि ने सिर नीचे धर दिया | प्रभु ने चरण धरकर दबाया तो बलि पाताल लोक में चला गया | अब भगवान चरण उठाने लगे तो बलि ने हाँथ पकड़कर कहा - इन्हें मै इस मंदिर में धरूँगा | भगवान बोले - यदि तुम बामन एकादशी का विधि सहित व्रत करो तो मै तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा | अत: बलि राजा ने बामन एकादशी का व्रत विधि सहित किया | तब से भगवान की एक प्रतिमा द्वारपाल बनकर पाताल में और एक क्षीरसागर में निवास करने लगी |

इन्दिरा एकादशी - आश्विन मॉस
आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी ' इन्दिरा एकादशी ' कहलाती है | इस दिन शालिग्राम की पूजा कर व्रत करना चाहिए | पवित्र होकर शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराकर वस्त्र पहनावें, भोग लगाएं तथा पूजा - आरती करें | पंचामृत वितरण कर शालिग्राम पर तुलसी अवश्य चढ़ानी चाहिए | इस प्रकार जो इस व्रत को करते हैं वे करोड़ पितरो का उद्धार कर स्वयं स्वर्गलोक को जाते हैं |
इन्दिरा एकादशी की कथा -
एक समय राजा इन्द्रसेन माहिष्मती नगरी में राज्य करते थे | उनके माता -पिता दिवंगत हो चुके थे | अकास्मात एक दिन उन्हें स्वप्न हुआ की तुम्हारे माता - पिता यमलोक में कष्ट भोग रहे हैं | निद्रा भंग होने पर वे चिंतित हुए कि किस प्रकार इस यातना से पितरो को मुक्त किया जाए | इस विषय पर मंत्री से परामर्श किया | मंत्री ने विद्वानों को बुलाकर पूछने कि सलाह दी | राजा ने ऐसा ही किया | सभी ब्राह्मणों के उपस्थित होने पर स्वप्न कि बात पेश कि गई | ब्राह्मणों ने कहा - राजन ! यदि आप सकुटुम्ब इंदिरा एकादशी व्रत करें तो आपके पितरो कि मुक्ति हो जायेगी | उस दिन आप शालिग्राम कि पूजा, तुलसी आदि चढ़ाकर ११ ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें और आशीर्वाद लें | इससे आपके माता पिता स्वयं ही स्वर्ग में चले जायेंगे | आप रात्री को मूर्ती के पास ही शयन करना '' राजा ने ऐसा ही किया | जब मंदिर में सो रहा था तभी भगवान के दर्शन हुए और उन्होंने कहा कि हे राजा -  व्रत के प्रभाव से तेरे सभी पिटर स्वर्ग को पहुँच गए | राजा इद्रसेन भी इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में सुख भोगकर अंत में स्वर्ग को गया |

पापांकुशा एकादशी - आश्विन मॉस
आश्विन मॉस शुक्ल पक्ष कि एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं | यह एकादशी पापरूपी हाथी को महावत रुपी अंकुश से बेधने के कारण पापांकुशा एकादशी कहलाती है | इस दिन भगवान विष्णु कि पूजा करनी चाहिए | एवं ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए | इस एकादशी व्रत रखने से समस्त पापों का नाश हो जाता है|
पापांकुशा एकादशी व्रत कि कथा -
विन्ध्याचल पर्वत पर एक महाक्रूर बहेलिया रहता था | जिसका कर्म के अनुसार नाम भी क्रोधन था | उसने अपना समस्त जीवन हिंसा, लूटपाट, मिथ्या, भाषण तथा शराब पीने व वेश्यागमन में ही बिता दिया | यमराज ने उसके अंतिम समय से एक दिन पूर्व अपने दूतो को उसे लाने के लिए भेजा | दूतों ने क्रोधन को बताया कि कल तुम्हारा अंतिम समय है, हम तुम्हे लेने आये हैं | मृत्यु के डर से क्रोधन अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचा उसने ऋषि से अपनी रक्षा हेतु बहुत ही विनय पूर्वक प्रार्थना कि | ऋषि को उसपर दया आ गई | उन्होंने उससे आश्विन शुक्ल कि एकादशी का व्रत तथा भगवान विष्णु कि पूजन का विधान बताया | संयोग से उसदिन एकादशी ही थी | क्रोधन ने ऋषि द्वारा बताये अनुसार एकादशी का विधिवत व्रत एवं पूजन किया | भगवान कि कृपा से वह विष्णुलोक को गया | उधर यमदूत हाथ मलते रह गए |

रमा एकादशी - कार्तिक एकादशी
यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान केशव का सम्पूर्ण वस्तुओं से पूजन, नैवेद्य तथा आरती कर प्रसाद वितरित करके ब्राह्मणों को खिलाएं तथा दक्षिणा बांटे | जो मनुष्य इस एकादशी को व्रत करते हैं उनके समस्त ब्रह्माहत्या आदि के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अंत में विष्णु लोक को जाते हैं |
रमा एकादशी की कथा -
एक समय मुचकुंद नाम का दानी, धर्मात्मा राजा राज्य करता था | उसे एकादशी व्रत का पूरा विश्वाश था | इससे वह प्रत्तेक एकादशी को व्रत करता तथा राज्य की प्रजा पर भी यही नियम लागू करता था | उसकी चन्द्रभागा नाम की एक कन्या थी | वह भी पिता से अधिक इस व्रत पर विश्वास करती थी | उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ | जो राजा मुचकुंद के साथ ही रहता था | एकादशी के दिन सभी व्यक्तियों ने व्रत किये | शोभन ने भी व्रत किया किन्तु अत्यंत कमजोर होने से भूख से व्याकुल हो मृत्यु को प्राप्त हो गया | इससे राजा - रानी और पुत्री अत्यंत दुखी हुए | शोभन को व्रत के प्रभाव से मंदराचल पर्वत पर धनधान्य से युक्त एवं शत्रुओं से रहित एक उत्तम देवनगर में आवास मिला वहां उसकी सेवा में रम्भादी अप्सराएँ तत्पर थी | अचानक एक दिन राजा मुचकुंद मंदराचल पर टहलते हुए पहुंचा तो वहां पर अपने दामाद को देखा और घर आकर सब वृत्तांत पुत्री से बताया | पुत्री भी समाचार पाकर पति के पास चली गई तथा सुख से ही पर्वत पर रम्भादिक अप्सराओं से सेवित निवास करने लगे |
देव उठनी एकादशी - कार्तिक मॉस
कार्तिक की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी या देव उठनी एकादशी कहते है | इस दिन शाम को जमीन को पानी से धोकर खड़िया मिट्टी व गेरू से देवी के चित्र बनाकर सूखने के बाद उन पर एक रुपया, रुई, गुड़, मूली, बैगन, सिंघाड़े, बेर उस स्थान पर रखकर एक परात से ढक देते हैं | रात्री में परात बजाकर, देव उठने के गीत या बधावा गाते हैं | बधावा गाने के बाद दीपक से परात में बनी काजल सभी लगाते हैं | शेष काजल उठकर रख लेते हैं | आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शयन किये हुए देव इस कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन उठते हैं | और सभी शुभ कार्य विवाह आदि इअसी दिन से शुरू हो जाते हैं यह पूजा उसी स्थान पर करतें हैं जहां होली, दीवाली इत्यादि की पूजा करतें हैं | कुछ स्त्रियाँ इसी एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम के विवाह का आयोजन भी करती है | तुलसी - शालिग्राम विवाह पूरी धूम - धाम से उसी प्रकार किया जाता है | जिस प्रकार सामान्य विवाह | शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि जिन दम्पत्तियों के कन्या नहीं होती, वे तुलसी विवाह करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त करतें हैं |

उत्पन्ना एकादशी - अगहन मॉस
उत्पन्ना एकादशी का व्रत मार्गशीर्ष मॉस की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है | इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विधान है | एकादशी का व्रत रखने वाले दशमी के दिन शाम को भोजन नहीं करते हैं | एकादशी के दिन ब्रह्मवेला में भगवान कृष्ण की पुष्प, जल, धूप, अक्षत से पूजा की जाती है | इस व्रत में केवल फलो का ही भोग लगाया जाता है | यह ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिदेवों का संयुक्त अंश माना जाता है | यह अंश दत्तात्रेय क रूप में प्रकट हुआ था | यह मोक्ष देने वाला व्रत माना जाता है |
उत्त्पन्न एकादशी की कहानी -
सत्य युग में एक बार मुर नामक दैत्य ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर इन्द्र को अपदस्थ कर दिया | देवता भगवान शंकर की शरण में पहुंचे | भगवान शंकर ने देवताओं को विष्णुजी के पास भेज दिया | विष्णु जी ने दानवों को तो परास्त कर दिया परन्तु मुर भाग गया | विष्णु ने मुर को भागता देखकर लड़ना छोड़ दिया | और बद्रिकाश्रम की गुफा में आराम करने लगे | मुर ने वहां पहुंचकर विष्णु जी को मारना चाहा | तत्काल विष्णु जी के शरीर से एक कन्या का जन्म हुआ, जिसने मुर का वध कर दिया | उस कन्या ने विष्णु को बताया कि मै आपके वंश से उत्पन्न शक्ति हूँ | विष्णु जी ने प्रसन्न होकर उस कन्या को आशीर्वाद दिया कि तुम संसार में मायाजाल में उलझे तथा मोह के कारण मुझसे विमुख प्राणियों को मुझ तक लाने में सक्षम हो जाओगी | तुम्हारी आराधना करने वाले प्राणी आजीवन सुखी रहेंगे | यही कन्या ' एकादशी ' कहलाई | वर्ष कि २४ एकादशियों में यही एकादशी ऐसी है जिसका महात्म्य अपूर्व है |

मोक्षदा एकादशी - अगहन मॉस
मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष कि एकादशी मोक्षदा एकादशी के नाम से जानी जाती है | इस दिन दामोदर भगवान कि पूजा कि जाती है | पूजा में दामोदर भगवान को धूप,. दीप, नैवेद्य पूजा पदार्थों से करनी चाहिए | और भक्ति पूर्वक कीर्तन औए जागरण करना चाहिए |
मोक्षदा एकादशी व्रत कि कथा -
प्राचीन गोकुल नगर में धर्मात्मा और भक्त वैखानस नाम का राजा था | उसने रात्री को स्वप्न में अपने पूज्य पिता को नरक भोगते हुए देखा | प्रात: काल उसने ज्योतिषी वेदपाठी ब्राह्मणों से पूछा कि मेरे पिता का उद्धार कैसे होगा ?
ब्राह्मण बोले ! यहाँ समीप ही पर्वत ऋषि का आश्रम है | उनकी शरणागति से आपके पिता शीघ्र ही स्वर्ग को चले जायेंगे | राजा पर्वत ऋषि के शरण में गया और दंडवत कर के कहने लगा | मुझे रात्रि में स्वप्न में पिता का दर्शन हुआ | वह बिचारे यमदूतों के हांथो से दंड पा रहे हैं | अत: आप अपने योग बल से बताये कि उनकी मुक्ति किस साधन से जल्दी होगी | मुनि ने विचार कर कहा कि धर्म  - कर्म सब देरी फल देने वाले है | शीघ्र वरदाता तो केवल शंकर जी हैं | उनको प्रसन्न करना भी कोई आसान काम नहीं | देर अवश्य लग जायेगी और तेरे पिता कि इतने तक यमदूत मरम्मत कर देंगे | इसलिए सबसे सुगम और शीघ्र फलदाता मोक्षदा एकादशी का व्रत है | उसे विधि पूर्वक परिवार सहित करके | पिता को संकल्प कर दो उनकी मुक्ति हो जायेगी | राजा ने कुटुंब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत करके फल पिता को अर्पण कर दिया | वह स्वर्ग को चले गए और जाते हुए पुत्र से बोले मै परम धाम को जा रहा हूँ |
श्रद्धा भक्ति से जो मोक्षदा एकादशी का महात्यम सुनता है उसे १० यज्ञ का फल मिलता है |

सफला एकादशी - पौष मॉस
यह व्रत पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान अच्युत कि पूजा का विशेष विधान है | इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिए कि प्रात: स्नान करके भगवान की आरती करें तथा भोग लगायें | ब्राह्मणों तथा गरीबो को भोजन अथवा दान देना चाहिए | रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में सफलता मिलती है | इसलिए इसका नाम ' सफला ' एकादशी है |
सफला एकादशी व्रत की कथा -
चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था | उसका बड़ा बेटा लुम्पक बड़ा दुराचारी था | मांस, मदिरा, परस्त्री मगन, वेश्याओं का संग इत्यादि कुकर्मो से परिपूर्ण था | पिता ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया | वन में एक पीपल का वृक्ष था | जो भगवान को भी प्रिय था | सब देवताओं की क्रीडा स्थली भी वहीँ थी | ऐसे पतित पावन वृक्ष के सहारे लुम्पक भी रहने लगा | परन्तु फिर भी उसकी चाल टेढ़ी ही रही | पिता के राज्य में चोरी करने चला जाता तो पुलिस पकड़कर छोड़ देती थी | एक दिन पौष मॉस के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात्रि को उसने लूट - मार एवं अत्याचार किया तो पुलिस ने उसके वस्त्र उतारकर वन को भेज दिया | वह बेचारा पीपल की शरण में आ गया | इधर हेमगिरी पर्वत की पवन भी आ पहुंची | लुम्पक पापी के सब अंगो में गठिया रोग ने प्रवेश किया | हाँथ, पाँव अकड़ गयें | अत: सूर्योदय होने के बाद कुछ दर्द कम हुआ | पेट का गम लगा | जीवों के मारने में आज असमर्थ था | वृक्ष पर चढ़ने की शक्ति भी नहीं थी | नीचे गिरे हुए फल बिन लाया | और पीपल की जड़ में रखकर कहने लगा की हे प्रभू - वन फलो का आप ही भोग लगाइए | मै अब भूख हड़ताल करके शरीर को छोड़ दूंगा | मेरे इस कष्ट भरे जीवन से मौत भली ऐसा कहकर प्रभू की ध्यान में मग्न हो गया | रात भर नींद न आई भजन - कीर्तन करता रहा | परन्तु प्रभू ने उन फलो का भोग न लगाया | प्रात: काल हुआ तो एक दिव्य अश्व आकाश से उतर कर उसके सामने प्रकट हुआ और आकाशवाणी द्वारा नारायण कहने लगे | तुमने अनजाने में सफला एकादशी का व्रत किया | उसके प्रभाव से तेरे समस्त पाप नष्ट हो गए | अग्नि को जान कर या अनजाने हाँथ लगाने से हाँथ जल जाते हैं | वैसे ही एकादशी भूलकर रखने  से भी अपना प्रसाद दिखाती है | अब तू इस घोड़े पर सवार होकर पिता के पास जाओ राज्य मिल जाएगा | सफला एकादशी सर्व कार्य सफल करने वाली है | प्रभू आज्ञा से लुम्पक पिता के पास आया | पिता उसे राज्य गद्दी पर बैठा कर ताप करने वन को चला गया | लुम्पक के राज्य में प्रजा एकादशी व्रत विधि सहित किया करती थी | सफला एकादशी का कथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है |

पुत्रदा एकादशी - पौष मॉस
यह व्रत पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है | इस व्रत के करने से संतान की प्राप्ति होती है |
पुत्रदा एकादशी की कथा -
किसी समय भद्रावती नगरी में सुकेतु नाम के राजा राज्य करते थे राजा तथा उनकी स्त्री शैव्या दानशील तथा धर्मात्मा थे | सम्पूर्ण राज्य, खजाना धन - धान्य से पूर्ण होने के बावजूद भी राजा संतानहीन होने के कारण अत्यंत दुखी होने के कारण अत्यन्त दुखी थे | एक बार वे दोनों राज्य - भार मंत्रियों के ऊपर छोड़कर वनवासी हो गयें तथा आत्महत्या करने की ठान ली | लेकिन उन्हें सहसा याद आया कि आत्महत्या के सामान कोई दूसरा पाप नहीं | इसी उधेड़बुन में वे दोनों वहां आये, जहां मुनियों का आश्रय व् जलाशय था | राजा - रानी मुनियों को प्रणाम कर बैठ गयें | मुनियों ने योगबल से राजा से दुःख का कारण जान लिया और राजा रानी को आशीर्वाद देते हुए ' पुत्रदा एकादशी ' व्रत रखने को कहा | राजा - रानी ने पुत्रदा एकादशी व्रत रखकर विष्णु भगवान कि पूजा कि और पुत्र रत्न प्राप्त किया |

षटतिला एकादशी - माघ मॉस
यह व्रत माघ कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इसके अधिष्ठाता देव भगवान विष्णु हैं | पंचामृत में तिल मिलाकर भगवान को स्नान करायें | इस प्रकार जो मनुष्य जितने तिलों का दान करता है वह उतने ही सहस्र वर्ष स्वर्ग में वास करता है | तिलमिश्रित पदार्थ को स्वयं खायें तथा ब्राह्मणों को खिला दें | दिन में हरी कीर्तन कर रात्रि में भगवान कि मूर्ती के सामने सोना चाहिए | छः प्रकार के तिल प्रयोग होने के कारण इसे ' षटतिला एकादशी ' के नाम से पुकारते हैं | इस प्रकार नियम पूर्वक पूजा करने पर बैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है |
षटतिला एकादशी की कथा -
प्राचीन काल में वाराणसी में एक गरीब अहीर रहता था | दीनता से काहिल वह बेचारा कभी - कभी भूखा ही बच्चो समित आकाश में तारे गिनता रहता | उसकी जिंदगी बसर करने का सहारा केवल जंगल की लकड़ी थी, वह भी जब न बिकती तो फाके मारकर रह जाता | एक दिन वह अहीर किसी साहूकार के घर लकड़ी पहुंचाने गया | वहां जाकर देखता है कि किसी उत्सव कि तैयारी हो रही है | जानने कि उत्कट इच्छा होने से वह साहूकार से पूछ बैठा - बाबूजी ! यह किस चीज कि तैयारी हो रही है ? तब सेठ जी बोले - यह षटतिला एकादशी व्रत की तैयारी की जा रही है | इससे घोर पाप, रोग हत्या आदि भवबन्धनों से छुटकारा तथा धन, पुत्र की प्राप्ति होती है | यह सुनक अहीर घर जाकर उस दिन के पैसे का सामान खरीदकर लाया और एकादशी का विधिवत व्रत रखा | परिणामस्वरूप वह कंगाल से धनवान हो गया | और वाराणसी नगरी में एक विशिष्ट व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया जाने लगा |

जया एकादशी - माघ मॉस
यह व्रत माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है | इस तिथि को भगवान केशव ( कृष्ण ) की पुष्प, जल, अक्षत, रोली तथा विशिष्ट सुगन्धित पदार्थों से पूजन करके आरती उतारनी चाहिए | भगवान को भोग लगाए गए प्रसाद को भक्त स्वयं खायें |
जया एकादशी व्रत की कथा -
एक समय की बात है | इन्द्र की सभा में माल्यवान नामक गंधर्व गीत गा रहा था, परन्तु उसका मन अपनी नवयौवना सुंदरी में आसक्त था | अतएव स्वर लय भंग हो रहा था यह लीला इन्द्र को बहुत बुरी तरह से खटकी, तब उन्होंने क्रोधित होकर कहा - हे दुष्ट गंधर्व ! तू जिसकी याद में मस्त है वह और तू पिशाच हो जाए | इन्द्र के शाप से वे हिमालय पर पिशाच बनकर दुःख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे | दैवयोग से एक दिन माघ मॉस के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया | वह दिन फल - फूल खाकर उन्होंने व्यतीत किया | दूसरे दिन सुबह होते ही व्रत के प्रभाव से उनकी पिशाच देह छूट गई और अति सुन्दर देह धारण कर स्वर्गलोक को चले गए |

विजया एकादशी - फाल्गुन मॉस
यह व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से अनन्त पुण्य होता है | पूजन में धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि चढ़ाया जाता है |
सप्त अन्न युक्त घट स्थापित किया जाता है | जिसके ऊपर विष्णु जी की मूर्ती रखी जाती है | इस तिथि को २४ घंटे कीर्तन करके दिन - रात बिताना चाहिए | द्वादशी के दिन अन्न से भरा घड़ा ब्राह्मण को दिया जाता है | इस व्रत के प्रभाव से दुःख - दारिद्रय दूर हो जाते हैं, समस्त कार्यों में विजय प्राप्त होती है | इसकी कथा भगवान राम की लंका विजय से सम्बंधित है |
विजया एकादशी की कथा -
जब भगवान राम वानर दल के साथ सिन्धु तट पर पहुंचे तो रास्ता रुक गया | पास में एक दालभ्य मुनि का आश्रम था जिसने अनेक ब्रह्मा अपनी आँखों से देखें थें | ऐसे चिरंजीव मुनि के दर्शनार्थ राम लक्ष्मण सहित सेना लेकर चले | शरण में जाकर मुनि को दण्डवत प्रणाम करके समुद्र से पार होने का उपाय पुछा तो मुनि बोले - कल विजया एकादशी है उसका व्रत आप सेना सहित करें | समुद्र से पार होने का तथा लंका को विजय करने का सुगम उपाय यही है | मुनि की आज्ञा से राम - लक्ष्मण ने सेना सहित विजया एकादशी का व्रत किया, रामेश्वर का पूजन किया | विजया एकादशी के महात्यम्य को सुनने से हमेशा विजय होती है |

आमलकी एकादशी - फाल्गुन मॉस
यह व्रत फाल्गुन शुक्ल एकादशी को किया जाता है | आंवलें के वृक्ष में भगवान का निवास होने के कारण इसका पूजन किया जाता है |
आमलकी एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन काल में भारत देश में चित्रसेन नामक राजा राज्य करते थे | उनके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व था | समस्त लोग एकादशी व्रत को किया करते थे | एक दिन वह राजा जंगल में शिकार खेलते - खेलते काफी दूर निकल गयें तभी कुछ जंगली जातियों ने उन्हें आकर घेर लिया | जंगलियों ने राजा के ऊपर अस्त्र - सस्त्रों का कठिन प्रहार किया, मगर उन्हें कोई कष्ट न हुआ | यह देखकर वे सब आश्चर्यचकित रह गयें | जब उन जंगली जातियों की संख्यां देखते ही देखते बहुत बढ़ गई तो राजा संज्ञाहीन होकर पृथ्वी पर धराशायी हो गये | उसी समय उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई | जो उन समस्त राक्षसों को मारकर अदृश्य हो गई |
जब राजा की चेतना लौटी तो उन्होंने देखा की समस्त जंगली मरे पड़े हैं | अब वे इस उधेड़बुन में पद गये की उन्हें किसने मारा ? तभी आकाशवाणी से यह सुनाई पड़ा की हे राजन ! ये  समस्त आक्रामक तुम्हारे पिछले जन्म की आमल एकादशी के व्रत के प्रभाव से मर गयें हैं |
यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ तथा समस्त राज्य में इस एकादशी के माहात्य्मय को कह सुनाया | जंगलियों के विनाश से समस्त प्रजा सुख - चैन की वंशी बजाने लगी |

पापमोचनी एकादशी - चैत्र मॉस
यह व्रत चैत्र मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है | इस दिन भगवान विष्णु को अर्ध्यदान आदि देकर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए |
पापमोचनी एकादशी व्रत की कथा -
प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक अति रमणीक वन था | इसी वन में देवराज इंद्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वछंद विहार करते थे | मेधावी नमक ऋषि भी यहीं तपस्या करतें थें | ऋषि शैवोपासक तथा अप्सराएँ शिवद्रोहिणी अनंग दासी ( अनुचरी ) थी | एक समय का प्रसंग है कि रतिनाथ कामदेव ने मेधावी मुनि कि तपस्या भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक अप्सरा को नृत्यगान करने के लिए उनके सम्मुख भेजा | युवावस्था वाले ऋषि अप्सरा के हाव - भाव, नृत्य, गीत कटाक्षो पर काम से मोहित हो गयें | रति - क्रीड़ा करते हुए ५७ वर्ष बीत गयें | मंजुघोषा ने एक दिन अपने स्थान पर जाने की आज्ञा मांगी आज्ञा माँगने पर मुनि के कानो पर चींटी दौड़ी तथा उन्हें आत्मज्ञान हुआ | अपने को रसातल में पहुंचाने का एक मात्र कारण अप्सरा मंजुघोषा को समझकर मुनि ने उसे पिशाचिनी होने का शाप दे दिया | शाप सुनकर मंजुघोषा ने वायु द्वारा प्रताड़ित कदली वृक्ष की भाँती कांपते हुए मुक्ति का उपाय पूछा | तब मुनि ने पापमोचनी एकादशी का व्रत रखने को कहा | वह विधि - विधान बताकर मेधावी ऋषि पिता च्यवन के आश्रम में गयें | शाप की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र की घोर निंदा की तथा उन्हें चैत्र मास की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की आज्ञा दी | व्रत करने के प्रभाव से मंजुघोषा अप्सरा पिशाचिनी देह से मुक्त हो सुन्दर देह धारण कर स्वर्ग लोक को चली गई |

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