Rahukaal Today/ 7 December 2016 (Delhi)-14 December 2016

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Mata Maha Laxmi Puja
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Mata Maha Laxmi Puja 2015


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महालक्ष्मी व्रत 2015

चंचल आज बहुत खुश है वो फूली नहीं समां रही है ,बात ही कुछ ऐसी है | बड़ी बेटी इंजीनियरिंग करके विदेश में अपने पति के साथ रह रही है और ऊँचे पद पर कार्यरत है | दामाद जी भी ऊँचे पद पर कार्य कर रहे है | छोटी बेटी विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है और बेटे की भी शानदार नौकरी लग गयी | चंचल इन उपलब्धियों को पाकर हैरान है आज उसके पति का भी बहुत बड़ा नाम है बहुत इज्जत है |देश-विदेश में उनकी प्रसिद्धि  है तीनों बच्चे अपने-अपने काम पर  चले गए और पतिदेव भी अपने काम के सिलसिले में दूसरे शहर गए हुए है |इतना भव्य घर बड़ी- बड़ी कारें ,नौकर चाकर ,एक से बढ़कर एक कपडे जेवर जिस किसी चीज के बारे में आप सोंच सकते है आज सब कुछ है यह ऐशो-आराम यह सुख सब सुखद है लेकिन सबसे अच्छी उपलब्धि थी बच्चो को शिक्षा ,शादी और विदेशों में बसना | बार-बार मन में एक ही प्रश्न आता है की वो हम वही है जो सदा इस चिंता में रहते थे क्या हम अपने बच्चो को पढ़ा पायेगें | जिसे अपने ही रिश्तेदार पहचानने से इंकार करते थे और आज जिनसे हम मिले भी नहीं दूसरे गाँव के लोग भी रिश्तेदार बन जाते है यह समय है |

तब भी हम ही थे और अब भी हम ही है क्योकि  कहा गया है "पुरुष बली नहीं होत है समय होत बलवान, भिल्लन लुटी गोपिका वाही अर्जुन वाही बाण  " प्रश्न यह है की क्या यह सब कुछ हमने अपनी मेहनत से बनाया है बिलकुल भी नहीं क्योकि मेहनत तो बहुत से लोग करते है लेकिन हर किसी को मेहनत का ऐसा फल नहीं मिलता हमको अच्छी तरह याद है काफी तंगी में वक्त गुजर रहा था और एक समय ऐसा आया, जब खाना कहाँ से आएगा यह प्रश्न आ गया था तभी एक चमत्कारी व्रत की जानकारी मिली व्रत थोड़ा मुश्किल था १६ दिन उपवास करना था शायद कठिन साधना करवाने के लिए था |

वही माँ ने कठिन समय दिखाया था जहाँ भोजन का जुगाड़ न हो वहां १६ दिन की क्या बात थी तो दोनों पति पत्नी ने विचार किया ऐसे भूखे  रहने से अच्छा है की व्रत ही रख लिया जाये | श्रद्धा भाव से विधि विधान की जानकारी की और व्रत की तैयारी  में लग गए भगवान के मंदिर की सफाई की और लक्ष्मी माँ को बैठाने के लिए पाटा ढूंढ ही रही थी की बाहर फाटक के खटकने की आवाज सुनकर चंचल बाहर आई तो क्या देखती है माँ की कृपा बरसने लगी थी जिसके दरवाजे पर कोई रुकता नहीं था आज न जाने कहा से पुराने मित्र शयाम और बिरजू दो बोरे आलू ले कर आये थे और बस यहीं से माँ के चमत्कार  का सिलसिला चल पड़ा और आज तक माँ की कृपा बरस  रही है|

माता महालक्ष्मी की पूजा :-

श्री महालक्ष्मी व्रत का प्रारम्भ भाद्रपद्र की शुक्ल अष्टमी के दिन से किया जाता है। यह व्रत सोलह दिनों तक चलता है। इस व्रत के दौरान धन की देवी मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 21 सितम्बर 2015 से प्रारम्भ होगा। व्रत का उद्यापन 05 अक्टूबर 2015 को होगा। इस व्रत में लक्ष्मी जी का पूजन किया जाता है।

श्री महालक्ष्मी व्रत विधि

प्रात:काल में स्नान आदि कार्यों से निवृत होकर, व्रत का संकल्प लिया जाता है। व्रत का संकल्प लेते समय निम्न मंत्रका उच्चारण किया जाता है-

करिष्यहं महालक्ष्मी व्रतमें त्वत्परायणा ।

तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत: ।।

अर्थात हे देवी, मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महाव्रत का पालन करूंगा। आपकी कृपा से यह व्रत बिना विध्नों के परिर्पूर्ण हों, ऐसी कृ पा करें।

यह कहकर अपने हाथ की कलाई में हाथ से बना हुआ डोरा बांध लें, जिसमें 16 गांठे लगी हों। आश्चिन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक यह व्रत किया जाता है और पूजा की जाती है। व्रत पूरा होने पर वस्त्रसे एक मंडप बनाया जाता है, उसमें लक्ष्मी जी की प्रतिमा रखी जाती है।

श्री लक्ष्मी को पंचामृत से स्नान कराने के बाद उनका सोलह प्रकार से पूजन किया जाता है। पूजन सामग्री में चन्दन, ताल, पत्र, पुष्प माला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकार के भोग रखे जाते है। नये सूत 16-16 की संख्या में 16  बार रखा जाता है। इसके बाद निम्न मंत्रका उच्चारण किया जाता है-

क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा ।

व्रतोनानेत सन्तुष्टा भवताद्विष्णुबल्लभा ।।

अर्थात क्षीर सागर से प्रकट हुई लक्ष्मी जी, चन्द्रमा की सहोदर, श्री विष्णु वल्लभा, महालक्ष्मी इस व्रत से संतुष्ट हों। इसके बाद चार ब्राह्माण और 16 ब्राह्माणियों को भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार यह व्रत पूरा होता है। जो इस व्रत को विधि-विधान से श्रद्धा पूर्वक करता है, उसे अष्ट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 16वें दिन इस व्रत का उद्धयापन किया जाता है। जो व्यक्ति किसी कारण से इस व्रत को 16 दिनों तक न कर पायें, वह तीन दिन तक भी इस व्रत को कर सकता है। व्रत के तीन दोनों में प्रथम दिन, व्रत का आंठवा दिन व व्रत के 16वें दिन का प्रयोग किया जा सकता है। इस व्रत को लगातार 16वर्षों तक करने से विशेष शुभ फल प्राप्त होते है। व्रत के दौरान अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। केवल फल, दूध, मिठाई का सेवन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है, एक बार एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्माण नियमित रूप से श्री विष्णु का पूजन किया करता था। उसकी पूजा-भक्ति से प्रसन्न होकर उसे भगवान श्री विष्णु ने दर्शन दिये ़और ब्राह्मण से अपनी मनोकामना मांगने के लिये कहा। ब्राह्मण ने लक्ष्मी जी का निवास अपने घर में होने की इच्छा जाहिर की। यह सुनकर श्री विष्णु जी ने लक्ष्मी जी की प्राप्ति का मार्ग ब्राह्मण को बता दिया, मंदिर के सामने एक  स्त्री आती है, जो यहां आकर उपले थापती है, तुम उसे अपने घर आने का आमंत्रण देना. वह स्त्री ही देवी लक्ष्मी हैं।

देवी लक्ष्मी जी के तुम्हारे घर आने के बार तुम्हारा घर धन और धान्य से भर जायेगा। यह कहकर श्री विष्णु जी चले गये। अगले दिन वह सुबह चार बचे ही वह ब्राह्मण मंदिर के सामने बैठ गया। लक्ष्मी जी उपले थापने के लिये आईं, तो ब्राह्मण ने उनसे अपने घर आने का निवेदन किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गई, कि यह सब विष्णु जी के कहने से हुआ है। लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा की तुम महालक्ष्मी व्रत करो, 16 दिनों तक व्रत करने और सोलहवें दिन रात्रि को चन्द्रमा को अर्ध्य देने से तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा।

ब्राह्मण ने देवी के कहे अनुसार व्रत और पूजन किया और देवी को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके पुकारा, लक्ष्मी जी ने अपना वचन पूरा किया।  उस दिन से यह व्रत इस दिन, विधि-विधान से पूरी श्रद्वा से किया

जाता है।

 

इस व्रत के लिए यह सलाह दी जाती हैं की व्यक्ति इसे १६ वर्ष तक निरंतर रहते हैं तथा "उमा महेश्वरी व्रत "१८ वर्ष तक रहे, यदि आप ये व्रत इस प्रकार से निरंतर रहते हैं तो सर्वथा सभी कामनाओं की पूर्ति होगी , इसमें कोई संशय नहीं |

 

क्रिया विधि :-

(1) -  माता महालक्ष्मी की स्थापना दक्षिण - पूर्व कोने में कीजिये |  

(2) -  लकड़ी की चौकी पर श्वेत रेशमी आसन (कपड़ा ) बिछाएं,

(3) - यदि आप मूर्ती का प्रयोग कर रहें हो तो उसे आप लाल वस्त्र से सजाएँ |

(4) - कलश पर नारियल लाल कपड़े में लपेट कर रखें |

(5) - यदि संभव हो तो कलश के बगल में एक अखण्ड ज्योति स्थापित करें |

(6) - सुबह तथा संध्या को पूजा आरती करें, मेवा मिठाई सफ़ेद दूध की बर्फी का नित्य भोग लगायें |

(7) - लाल कलावे का टुकड़ा लीजिये तथा उसमे १६ गांठे लगाकर कलाई में बांध लीजिये |

(8) - सुबह पूजा के समय प्रत्येक घर के सदस्य लाल गाँठ वाला धागा बांधे और पूजा के पश्चात इसे उतारकर लक्ष्मी जी के चरणों में रख दें इसका प्रयोग पुनः अंतिम दिन संध्या पूजा के समय होगा |

आखिरी दिन १६ दीपक जलाने होंगे, १६ चीजें एक सूप से ढककर, दूसरे सूप में रखकर दान करनी होगी, और रात में चंद्रोदय के बाद तारागणों को अर्घ्य देकर उत्तर दिशा में मुंह करके माता महालक्ष्मी को पुकारना होगा - हे माता महालक्ष्मी मेरे घर आ जाओ ,

इस प्रकार तीन बार पुकारना होगा |

अर्घ्य देने के बाद अन्दर आकर तीन थालियों में पूरा भोजन लगाना होगा | एक - एक थाली आप दोनों की और एक माता महालक्ष्मी की होगी |

नोट :- १६ गांठो वाला धागा अपनी तिजोरी में संभाल कर रखें, इससे आपको prosperity की प्राप्ति होगी |

दान सामग्री की सूची :- १६ वें दिन आपको ये सभी चीजें तैयार रखनी होगी, सभी चीजें १६ - १६ होनी चाहिए |

चुनरी, बिंदी, सिन्दूर, रिबन, कंघा, शीशा, श्वेत वस्त्र या रुमाल, सामर्थ के अनुसार, बिछिया, नाक की कील या नथ, फल, मिठाई, मेवा, लौंग, इलायची, दक्षिणा, मेहंदी |

 

महालक्ष्मी जी का मंत्र -: " ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः "

राशि -इस बार सभी राशि के लोग चांदी का बर्तन दान करें मनोकामना पूर्ण होगी |

महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति :-

 05 अक्टूबर 2015 को महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति हो रही है | इस व्रत की समाप्ति की विधि यानि व्रत के अन्तिम दिन किये जाने वाले कामो के बारे में बतायेंगे |

व्रत की पूजा की तैयारी/ सामग्री :- सोलहवें दिन यानि 05 अक्टूबर को आप को ये सामग्री पूजा के लिए जरूरत पड़ेगी |

१ - दो सूप

२ - 16 मिट्टी के दिये

३ -  प्रसाद के लिये सफ़ेद बर्फी

४ - १६ चीजें - हर चीज सोलह की तादाद में - लौंग, इलायची, मिठाई, सुहाग का सामान

५ - फूल माला

६ - तारों को अर्घ्य देने के लिये यथेष्ट पात्र

७ - १६ गांठ वाला लाल धागा

क्रिया विधि -

(१) - शाम के समय पूजा करनी है

(२) -  माता महालक्ष्मी के आगे 16 दीपक देसी घी के जलायें

(३) - माता का धूपदीप से पंचोपचार या षोडषोपचार पूजन करें

(४) - एक सूप में सोलह चीजें रखकर उसे दूसरे सूप से ढँक दें | इसे माता के निमित्त दान करने का संकल्प करें |

क्षीरोदार्णव सम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा .......|

(५) - अपने हाँथ में 16 गांठों वाला लाल धागा बांध लीजिये |

(६) - दीपक जलाकर मंत्र जाप कीजिये -

"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्री ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः "

जैसा आपने संकल्प किया हो उस हिसाब से मन्त्र जाप करिये |

(७) - जप के बाद माता की आरती कीजिये | भोग लगाइये

(८) - पूजा के बाद बाहर आकर तारों के प्रति अर्घ्य दीजिये | ये अर्घ्य चंद्रोदय के बाद ही देना है | 

(९) - अर्घ्य देने के बाद जीवन साथी का हाथ पकड़कर तीन बार उत्तर की ओर मुंह करके पुकारिये -

हे माता महालक्ष्मी मेरे घर आ जाओ, हे माता महालक्ष्मी मेरे घर आ जाओ, हे माता महालक्ष्मी मेरे घर आ जाओ |

 (१०) - अर्घ्य देने के बाद अन्दर आकर तीन थालियों में पूरा भोजन लगाइये | एक - एक थाली आप दोनों की और एक माता महालक्ष्मी की |

(११) - भोजन के बाद अपनी थालियाँ उठा लें लेकिन माता की थाली वहीं छोड़ दें | उसे रात में ढँक दें |

(१२) - अगले दिन माता जी की थाली किसी गाय को खिला दें और सूप में रखा हुआ दान का सामान किसी मंदिर में दान कर दें |

(१३) - नित्य माता महालक्ष्मी के मन्त्र का जप करते रहें |

(१४) - 16 गांठों वाला धागा अपनी तिजोरी में संभाल कर रखें |

 

उद्यापन की विधि

१ - व्रत के अंतिम दिन उद्यापन के समय दो सूप लें ( सिकरी), किसी कारण से आप को सूप ना मिले तो आप स्टील की नई थाली ले सकते हैं | इसमें 16 श्रृंगार के सामान 16 की ही संख्या में और दूसरी थाली अथवा सूप से ढकें, १६ दिये जलायें, पूजा करें, थाली में रखें सुहाग के सामान को देवी जी को स्पर्श कराएं एवं उसे दान करने का संकल्प लें |

२ - जब चन्द्रमा निकल आये तो लोटे में जल लेकर तारों को अर्घ्य दें तथा उत्तर दिशा की ओर मुंह करके पति - पत्नी एक दूसरे का हाँथ थाम कर के माता लक्ष्मी को अपने घर आने का ( हे माता महालक्ष्मी मेरे घर आ जाओ ) इस प्रकार तीन बार आग्रह करें |

३ - इसके पश्चात् एक सुन्दर थाली में माता महालक्ष्मी के लिये बिना लहसुन, प्याज का भोजन सजाएँ तथा घर के उन सभी सदस्यों की भी थाली लगायें जो व्रत हैं | यदि संभव हो तो माता

 को चांदी की थाली भोजन परोसें | ध्यान रखिये कि थाली ऐसे रखी होनी चाहिए कि माता कि मुंह उत्तर दिशा में हो बाकी व्रती पूर्व या पश्चिम दिशा कि ओर मुंह करके भोजन करें |

४ - भोजन में पूडी, सब्जी, रायता और खीर होनी चाहिए अर्थात वैभवशाली भोजन बनाएं |

५ - भोजन के पश्चात् माता कि थाली ढँक दें एवं सूप में रखा सामान भी रात भर ढंका रहने दें | सुबह उठकर इस भोजन को किसी गाय को खिला दें और दान सामग्री को किसी ब्राह्मण को दान करें, जो कि इस व्रत की अवधि में महालक्ष्मी का जाप करता हो या फिर स्वयं यह व्रत करता हो | यदि ऐसा संभव न  हो तो किसी भी ब्राह्मण को ये दान दे सकते हैं या किसी लक्ष्मी जी के मंदिर में देना अति उत्तम होगा |

 

Its recommended to keep a Sri yantra in is pooja you can call on 9971000225 to know more details about the Shri yantra. 




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