आज का राहुकाल/ 10 दिसंबर-16 दिसंबर (दिल्ली)

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देवशयनी एकादशी - 4 जुलाई 2017
अनुवाद उपलब्ध नहीं है |

चातुर्मास में नहीं होंगे शुभ कार्य



आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी होती है । देवशयनी एकादशी को हरिशयनी, पद्मनाभा तथा प्रबोधनी के नाम से भी जाना जाता है । भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा एकादशी भी कहा गया है । इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना गया है और इन चार महीनों यानी चातुर्मास में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर में राजा बलि के द्वार पर अनंत शैय्या पर शयन करते हैं । इसलिये इस चार महीने की अवधि में कोई भी यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा इत्यादि कई शुभ कार्य करना वर्जित है । चातुर्मास के बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने पर विष्णु भगवान का शयन समाप्त होता है । जिस दिन भगवान विष्णु का शयन समाप्त होता है, उसी दिन देवोत्थानी एकादशी का व्रत किया जाता है, साथ ही शुभ कार्य भी आरम्भ हो जाते हैं । देवशयनी एकादशी के दिन देह शुद्धि, सुंदरता व लम्बी आयु के लिए दही, घी और गोमूत्र का । वंश वृद्धि के लिए दूध का । समस्त कुल के पुण्य के लिए बिना मांगे हुए भोजन ग्रहण करें।

मधुर स्वर के लिए गुड़ का । शत्रुओं के नाश के लिए कड़वे तेल का । दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि  अथवा सौभाग्य के लिए मीठे तेल का । स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का । पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया भोजन, मूली एवं बैंगन आदि का भी देवशयनी एकादशी के दिन त्याग कर देना चाहिए । इस व्रत को करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।

संस्कृत में धार्मिक साहित्यानुसार हरि शब्द सूर्य, चन्द्रमा, वायु, विष्णु आदि अनेक अर्थांे में प्रयुक्त है । हरिशयन का तात्पर्य इन चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य-चन्द्रमा का तेज क्षीण हो जाना उनके शयन का ही द्योतक होता है । इस समय में पित्तस्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है । आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि चातुर्मास्य यानी वर्षा ऋतु में विविध प्रकार के कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं, जल की बहुलता और सूर्य-तेज का भूमि पर अति अल्प प्राप्त होना ही इनका कारण है । इस प्रकार के अस्थिर मौसम में स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेकानेक समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं, साथ ही वर्षा इत्यादि के कारण जीवन अस्त - व्यस्त रहता है । इस प्रकार की परिस्थितियों में किसी भी मांगलिक कार्य का आयोजन सुखद नहीं होता, संभवतः इसी दृष्टिकोण से चार महीने तक शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है ।

सूर्य के ‘उत्तरायण’ होने को ‘मकर संक्रान्ति’ तथा ‘दक्षिणायन’ होने को ‘कर्क संक्रान्ति’ कहा जाता है । श्रावण से पौष तक सूर्य का उत्तरी छोर से दक्षिणी छोर तक जाना ‘दक्षिणायन’ होता है । कर्क संक्रान्ति में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं ।

शास्त्रों एवं धर्म के अनुसार ‘उत्तरायण’ का समय देवताओं का दिन तथा ‘दक्षिणायन’ देवताओं की रात्रि होती है । इस प्रकार, वैदिक काल से ‘उत्तरायण’ को ‘देवयान’ तथा ‘दक्षिणायन’ को ‘पितृयान’ कहा जाता रहा है । इसी समय से देवताओं का चातुर्मास प्रारम्भ हो जाता है । धार्मिक मान्यता अनुसार इस अवधि में देवताओं की रात्रि प्रारम्भ हो जाती है ।

सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश ही ‘कर्क संक्रान्ति’ या ‘श्रावण संक्रान्ति’ कहलाता है । संक्रान्ति के पुण्य काल में दान, जप, पूजा, पाठ व दान पुण्य का कई गुना फल प्राप्त होता है ।

इसके बाद चार महीने की अवधि में कोई भी शुभ कार्य जैसे शादी-ब्याह आदि नहीं किए जाते हैं । शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है । उनके अनुसार इस दिन से चार महीने तक देवताओं का चातुर्मास प्रारंभ हो जाता है, जिसमें सभी देवता चार महीनों तक सोए रहते हैं, हालांकि इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क भी है क्योंकि कर्क संक्रांति से वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है और वर्षा ऋतु चार महीनों तक होती है, इस दौरान प्रकृति में बहुत से बैक्टीरियल बदलाव होते हैं, जो कि स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होते हैं और ऐसे में कोई सामूहिक कार्यक्रम करना बिल्कुल भी उचित नहीं होता, इसीलिए इन चार महीनों में शादी-ब्याह जैसे सामूहिक कार्यक्रम नहीं किए जाते । कर्क संक्रान्ति के पुण्य समय में उचित आहार-विहार पर विशेष बल दिया जाता है । वैसे तो वर्षा ऋतु के आरंभ होते ही चिकित्सकीय दृष्टि से भी आहार पर विशेष ध्यान देना उचित माना जाता है, क्योंकि ऐसे समय में कई प्रकार के अनचाहे जीव-जंतु उत्पन्न होते हैं जो संक्रमण को फैलाने का कारण बनते हैं ।

शास्त्रीय सलाह के अनुसार इस समय में शहद का प्रयोग विशेष तौर पर करना लाभकारी माना जाता है।

शहद में ग्लूकोज व अन्य शर्कराएं तथा विटामिन, खनिज और अमीनो अम्ल भी होता है जिससे कई पौष्टिक तत्व मिलते हैं जो घाव को ठीक करने और उतकों के बढ़ने के उपचार में मदद करते हैं । क्राइसिन, पाइनोबैंकसिन, विटामिन सी, कैटालेज, एवं पाइनोसेंब्रिन, बारिश के मौसम में बड़ी जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं । ऐसा इसलिये क्योंकि इस दौरान हमारे शरीर की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है और जरा सा बारिश में भीग जाने की वजह से हम बीमार पड़ जाते हैं । शहद है जो एंटीआॅक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरी होती है । शहद का एक चम्मच रोजाना सेवन करने से हमारा शरीर बारिश की तमाम बीमारियों से बचा रह सकता है । शहद आंतों को साफ करता है ।

वायरल फीवर और सर्दी-खांसी से लड़े - शहद में एंटीआॅक्सीडेंट और रोगाणुरोधी गुण होते हैं, जो खांसी और गले की समस्याओं में राहत प्रदान करती है । पेट के संक्रमण से राहत दिलाए ।

इम्यूनिटी बढ़ाए - बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाए । शहद में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं । यह बैक्टीरिया और जुर्म से लड़ने में मदद करती है । बारिश की वजह से काॅलरा और डायरिया ना हो जाए, इसलिये आपको शहद का सेवन जरूर करना चाहिये । बरसात के मौसम में बाहर की चीजें खाने से परहेज करें क्योंकि कई बार रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से बैक्टीरिया का हमला जल्दी होता है । मांसाहार के प्रयोग से भी बचें ।

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No auspicious functions should be organised in Chaturmas

ev Shayani Ekadashi is the Shukla Paksha Ekadashi of Ashadha month of Hindu calendar. It is also known as Hari Shayani, Padmanabha and Prabodhini. According to Bhavishya Purana, Padma Purana and Srimadbhagwat Purana Harishayani Ekadashi is also called as Yoganindra Ekadashi. This day is marked as commencement of Chaturmas (the 4 months period of rainy season). During this period of Chaturmas Lord Vishnu goes to Ksheersagar (ocean of milk) to rest on Anant – Shaiyya at the gates of King Bali. Therefore, this four months period is not considered for auspicious events like Yagyopavit (tread ceremony), Marriage, Deekshagrahan, Yajna, Grah-pravesh, Godaan, or any other ceremony. After Chaturmas, as the sun enters Libra, it signifies the end of sleep of the God Vishnu and the same day all the auspicious works can be started with Devothani fast. On the day of Devshayani Ekadashi, one should consume curd, Ghee, Cow-urine for purification of the body, beauty & long life; milk for strengthening future generation; and for the sacrosanctity of the entire family consume food that hasn't been obtained through 'Bhiksham'. Consume jaggery for a sweeter voice; Mustard oil to end the enemies; Sweet oil for long age, for child birth and good luck. Along with this one should leave, sleeping on bed, being with wife, lying, eating non-vegetarian food, honey, food provided by others, radish and brinjal on Dev Shayani Ekadashi. All the wishes of devotees come true by observing this fast. According to religious Sanskrit scriptures word 'Hari' also stands for sun, moon, wind, lord Vishnu etc. During these four months, energy of sun and moon decreases due to heavy rains and clouds which symbolises the sleep of lord Vishnu during Hari Shayan. During this period, body also looses its energy. Modern day scientists have also found that due to increase in water level and very less sunrays reaching earth in chaturmas or the rainy season various bacteria are born. Due to this imbalanced weather, various diseases occur and disturb the life pattern. And with such prevailing conditions, it is advised not to organise any auspicious ceremony. Uttarayana of the sun is called as 'Makar Sankranti' and Dakshinayan is called as 'Karka Sankranti' Uttarayana is basically the period when the Sun travels from Capricorn to Cancer, i.e. from south to north and Dakshinayana is the period when the Sun travels back from North to South; i.e. from Cancer to Capricorn. Days are longer and nights are shorter during Karka Sankranti. According to Hindu scriptures, 'Uttarayana' is day for gods and 'Dakshinayana' is night. Therefore, since Vedic period 'Uttarayana' is also knows as 'Devayana' and 'Dakshinayana' is knows as 'Pitrayana'. This is also commencement of chaturmas of gods. As per religious belief this is known to be night for gods. As the sun enters cancer, it is called as 'Karka Sankranti'. Prayers, offerings, chants etc made during this period are blessed multifold. After this, for four months period any auspicious ceremonies, such as marriageetc are not organised. It is mentioned in scriptures also that from this day chaturmas of gods begins during which all gods go to sleep. However, there is a scientific fact to it as well, as this is the beginning of rainy season which remains for four months; many bacterial changes take place in nature at this time which is harmful for health. And thus, any gathering or any public programme like marriage is not organised. During Karka Sankranti special attention is given to food and ambience. Also, with beginning of rainy season attention to healthy food and environment is advised; as during this season many micro-organisms are born which may cause communicable diseases. As per scriptures, honey has been advised as very useful during this period. Honey is rich in glucose, vitamin, mineral and amino acid which are healthy and helps in healing wounds and tissues. Chrysin, pinobanksin, vitamin c, ketogel and pinocembrin are easily affected by rain. This happens because immunity of body gets weaker during rainy season and thus, getting wet in rain makes us ill. Consuming a tablespoon of honey everyday can help fight all the diseases during rainy season. Honey cleanses intestines. Antioxidant and germ fighting quality of honey helps fight viral fever, cough and cold. It also keeps stomach healthy. For immunity, Honey is antibacterial and antifungal which prevents bacterial infections. It helps to fight bacteria and germs. To prevent cholera and diarrhoea it is necessary to take one tablespoon of honey daily. Avoid eating outside food during rainy season, as immunity is weak at this time and bacteria can attack easily. Avoid eating non-vegetarian food.

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