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06 फरवरी 2017, भक्तराज पुंडरीक
अनुवाद उपलब्ध नहीं है |

भक्तराज पुंडरीक


पंढरपुर महाराष्ट्र राज्य का एक प्रसिद्ध नगर और तीर्थ स्थल है जो दक्षिणी राज्य महाराष्ट्र में भीमा नदी के तट पर शोलापुर नगर में स्थित है। यहां एक विशाल मंदिर बना हुआ है जिसमें विट्ठल या विठोबा के रुप में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है । मंदिर में श्री विट्ठल भगवान कमर पर हाथ रखे खड़े हैं और उन्हीं के पास रुक्मिणी जी, बलराम जी, सत्यभामा, जाम्बवती और राधा जी का भी मंदिर है। श्रीकृष्ण भगवान के इस नाम और मंदिर के पीछे भक्त पुंडरीक की एक कहानी छिपी हुई है- पुंडरीक अपने माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन वे अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे तभी भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ वहां आ गए । पुंडरीक पैर दबाने में इतने मग्न थे कि उनका अपने इष्टदेव की ओर ध्यान ही नहीं गया । भगवान ने पुंडरीक को उनके नाम से पुकारा- पुंडरीक, हम तुम्हारे मेहमान बनकर आये हैं । जब पुंडरीक ने आवाज सुन पीछे मुड़कर देखा तो भगवान कृष्ण मंद-मंद मुस्का रहे थे । पुंडरीक ने भगवान से कहा कि मेरे माता-पिता अभी सो रहे हैं और मैं उनकी नींद में खलल नहीं डालना चाहता । जब तक मेरे माता-पिता उठते हैं तब तक आप यहां पड़ी ईटों पर खड़े हो जाइये । मैं कुछ ही देर में आपके पास आता हूं । ऐसा कहकर वे फिर से अपने पिता के पैर दबाने में मग्न हो गए । माता-पिता के प्रति पुत्र का ऐसा सेवा-भाव देखकर भगवान वहीं पड़ी ईटों पर खड़े हो गए । किंतु उनके माता-पिता को नींद ही नहीं आ रही थी और उन्होंने फिर से अपनी आंखें खोल दी । अपने मां-बाप को दोबारा उठा देखकर पुंडरीक भगवान से बोले कि आपको थोड़ा और इंतजार करना होगा । ऐसा कहकर वे फिर से पैर दबाने में मग्न हो गए । लेकिन इसी बीच पुंडरीक के माता-पिता और स्वयं पुंडरीक स्वर्ग सिधार गए । इस तरह से जिस स्थान पर भगवान ने अपने भक्त को दर्शन दिये वहां बाद में एक मन्दिर की स्थापना की गई, जिसे आज भी विट्ठल मंदिर के नाम से जाना जाता है । ईंट पर खड़े रहने के कारण श्रीकृष्ण भगवान को विट्ठल के नाम से जाना गया और वह जगह पंढरपुर कहलायी।

भक्तराज पुंडरीक

पंढरपुर महाराष्ट्र राज्य का एक प्रसिद्ध नगर और तीर्थ स्थल है जो दक्षिणी राज्य महाराष्ट्र में भीमा नदी के तट पर शोलापुर नगर में स्थित है। यहां एक विशाल मंदिर बना हुआ है जिसमें विट्ठल या विठोबा के रुप में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है । मंदिर में श्री विट्ठल भगवान कमर पर हाथ रखे खड़े हैं और उन्हीं के पास रुक्मिणी जी, बलराम जी, सत्यभामा, जाम्बवती और राधा जी का भी मंदिर है। श्रीकृष्ण भगवान के इस नाम और मंदिर के पीछे भक्त पुंडरीक की एक कहानी छिपी हुई है-

पुंडरीक अपने माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन वे अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे तभी भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ वहां आ गए । पुंडरीक पैर दबाने में इतने मग्न थे कि उनका अपने इष्टदेव की ओर ध्यान ही नहीं गया । भगवान ने पुंडरीक को उनके नाम से पुकारा- पुंडरीक, हम तुम्हारे मेहमान बनकर आये हैं । जब पुंडरीक ने आवाज सुन पीछे मुड़कर देखा तो भगवान कृष्ण मंद-मंद मुस्का रहे थे । पुंडरीक ने भगवान से कहा कि मेरे माता-पिता अभी सो रहे हैं और मैं उनकी नींद में खलल नहीं डालना चाहता । जब तक मेरे माता-पिता उठते हैं तब तक आप यहां पड़ी ईटों पर खड़े हो जाइये । मैं कुछ ही देर में आपके पास आता हूं । ऐसा कहकर वे फिर से अपने पिता के पैर दबाने में मग्न हो गए । माता-पिता के प्रति पुत्र का ऐसा सेवा-भाव देखकर भगवान वहीं पड़ी ईटों पर खड़े हो गए । किंतु उनके माता-पिता को नींद ही नहीं आ रही थी और उन्होंने फिर से अपनी आंखें खोल दी । अपने मां-बाप को दोबारा उठा देखकर पुंडरीक भगवान से बोले कि आपको थोड़ा और इंतजार करना होगा । ऐसा कहकर वे फिर से पैर दबाने में मग्न हो गए । लेकिन इसी बीच पुंडरीक के माता-पिता और स्वयं पुंडरीक स्वर्ग सिधार गए । इस तरह से जिस स्थान पर भगवान ने अपने भक्त को दर्शन दिये वहां बाद में एक मन्दिर की स्थापना की गई, जिसे आज भी विट्ठल मंदिर के नाम से जाना जाता है । ईंट पर खड़े रहने के कारण श्रीकृष्ण भगवान को विट्ठल के नाम से जाना गया और वह जगह पंढरपुर कहलायी।

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