आज का राहुकाल/ 10 दिसंबर-16 दिसंबर (दिल्ली)

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सगुण तत्वों का मिलन
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सगुण तत्वों का मिलन


चाहे मथुरा, वृंदावन, बरसाने और बनारस की बात ले लें या फिर बारबंकी में सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह

की, भारत के हर कोने में अलग-अलग सभ्यताओं का मिलन देखने को मिलता है...


चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन रंग पंचमी का यह त्योहार मनाया जाता है । रंग पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा को ही रंग पंचमी कहते हैं । होली के दिन होलिका पूजन किया जाता है और होली के अगले दिन, यानि धुलेंडी पर रंग खेला जाता है । लेकिन भारत में कई जगहों पर होली और धुलेंडी के साथ पांच दिनों तक रंग खेलने की परंपरा है । यहां तक कि कई जगहों पर तो रंग पंचमी के दिन धुलेंडी से भी ज्यादा रंग खेला जाता है । रंग पंचमी के विविध रंग जीवन में नई उमंगों का संचार करते हैं । इस दिन अनिष्ट शक्तियों का विघटन हो जाता है। रंग पंचमी सगुण आराधना का भाग है । कहते हैं इस दिन विभिन्न देवताओं के सगुण तत्व वायुमंडल में उडाए जाने वाले विभिन्न रंगों के कणों की ओर आकर्षित होते हैं । देवताओं के इन तत्वों के स्पर्श की अनुभूति लेना ही रंग पंचमी का उद्देश्य है । रंग पंचमी का यह त्योहार भारत में विभिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीको से मनाया जाता है ।

मध्यप्रदेश- में रंगपंचमी खेलने की परंपरा काफी पौराणिक और मजेदार है । इस दिन राजधानी भोपाल में जहां झाकियां निकलती हैं तो वहीं मालवा और इंदौर में गैर(रंग खेलने वालों की टोली) की परंपरा है । नए भोपाल से लेकर पुराने भोपाल तक हर तरफ बस अबीर-गुलाल ही उड़ता नजर आता है । इन झांकियों में लोग तरह-तरह के स्वांग रचकर रंग खेलते नजर आते  हैं । कहीं राधा-कृष्ण नजर आते हैं तो कहीं गोपियों की टोली होली के गीत गाती नजर आती है । मालवा और इंदौर में जगह-जगह निकलने वाले जुलूस में हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। जुलूस के साथ-साथ हैरतअंगेज कारनामे, बैंड-बाजे, नाचना-गाना और सबसे खास चीज- टैंकों के जरिये मोटर पंप से भर-भरकर गुलाल को एक-दूसरे पर फेंका जाना, ये सब माहौल में एक नई ताजगी भर देते हैं । इंदौर में तो रंग में मिला हुआ सुगंधित पानी भी फेंका जाता है, जिससे सारी सड़कों पर रंग पंचमी की खुशबू फैल जाती है । इस जुलूस की खास बात यह है कि इसमें सभी धर्मों के लोग शामिल होते हैं और किसी को भी कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया जाता । जिसका मन होता है वो इसमें शामिल होने खुद-ब-खुद पहुंच जाता है । यह गैर महिला सशक्तीकरण का संदेश भी देता है, क्योंकि इसमें महिलाएं भी विशेष रूप से बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। मध्यप्रदेश के मालवा और इंदौर के अलावा रंग पंचमी खंडवा, खरगोन और उज्जैन में भी धूम-धाम से मनाई जाती है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश के घरों में श्रीखंड, भजिए, आलूबड़े, भांग की ठंडाई, पूरनपोली, गुंजिया, पपड़ी की खुशबू से पूरा घर महक उठता है ।

महाराष्ट्र- में भी होली के बाद, खास तौर पर पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा है। यहां पर सूखे रंग के गुलाल से होली खेली जाती है । यहां महाराष्ट्र के मछुआरों के द्वारा यह त्योहार बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है । मछुआरों की बस्ती में रंग पंचमी के दिन खूब नाच-गाना और धमाल-मस्ती होती है । महाराष्ट्र के मछुआरे इस मौसम को शादी या रिश्ता तय करने के लिए बिल्कुल सही समय मानते हैं, क्योंकि इस त्योहार पर सारे मछुआरे एक-दूसरे से मिलने के लिए उनके घर जाते हैं और इसी मेल-मिलाप में वे शुभ काम की बातों का प्रस्ताव भी रख देते हैं । महाराष्ट्र में इस दिन भोजन में पूरनपोली बनाने का चलन है । उसके साथ आमटी, चावल और पापड़ आदि तलकर खाने की परंपरा भी है । महाराष्ट्र के कोंकण में रंगपंचमी को ‘शमिगो’ के नाम से भी मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश- में तो होली के रंग ही निराले नजर आते हैं । होली से लेकर रंग पंचमी के दिन तक यहां हर तरफ रंग ही रंग दिखाई पड़ता है । चाहें मथुरा, वृंदावन और बरसाने की बात ले लें या फिर बारबंकी में सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह की, यूपी के हर कोने में अलग-अलग सभ्यताओं का मिलन देखने को मिलता है । यहां हिंदू-मुस्लिम मिलकर एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं। यूपी के हर परिवार में इन दिनों बेसन के सेंव और दही-बड़े बड़े ही चांव से खाये जाते हैं । इसके साथ कांजी, भांग और ठंडाई का लुत्फ भी उठाया जाता है । होली पर गुंझिया यहां का मुख्य मिश्ठान है।

छत्तीसगढ़- आपने यूपी की लठमार होली के बारे में तो जरूर सुना होगा, लेकिन आपने छत्तीसगढ़ के जांजगीर से 45 किलोमीटर दूर पंतोरा गांव की लठमार होली के बारे में नहीं सुना होगा । करीब 300 वर्षों से भी अधिक समय से जारी यहां की लठमार होली अब यहां की परंपरा बन गई है । प्रति वर्ष धूल पंचमी, यानी रंगपंचमी के दिन इस गांव की कुंवारी कन्याएं गांव में घूम-घूम कर पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं । फिर चाहें वह पुरुष उनके गांव का हो या फिर किसी और गांव का, चाहें पुलिस वाला हो या फिर कोई सरकारी बाबू, इन लाठियों की मार तो हर किसी को झेलनी पड़ती है।

राजस्थान- रंग पंचमी के दिन होली की विदाई की जाती है । इस अवसर पर विशेष रूप से राजस्थान के जैसलमेर के मंदिर महल में अलग ही माहौल देखने को मिलता है। लोकनृत्यों में डूबा वहां का वातावरण रंगों से सराबोर नजर आता है। यहां हवा में लाल, नारंगी और फिरोजी रंग जमकर उड़ाए जाते हैं । इस दिन कई जगहों पर तो मेला भी लगता है । राजस्थान के पुष्कर में तो इस दिन किसी एक व्यक्ति को वहां के बादशाह के स्वरूप में तैयार करके सवारी भी निकाली जाती है ।

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