भद्रा और ग्रहण के बीच कैसे हो पाएगा होलिका दहन

भद्रा और ग्रहण के बीच कैसे हो पाएगा होलिका दहन

होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात यह पावन अनुष्ठान किया जाता है, लेकिन जब भद्रा और ग्रहण जैसे योग साथ हों, तो लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं, क्या होलिका दहन करना सही होगा? कब नहीं करना चाहिए? और सबसे अहम, भद्रा और ग्रहण में सही मुहूर्त क्या होगा? आइए, इन सभी प्रश्नों का समाधान शास्त्रसम्मत और व्यावहारिक तरीके से समझते हैं।

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भद्रा में होलिका दहन कैसे करें?

सामान्यतः भद्रा काल को अशुभ माना जाता है और इस दौरान शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है। लेकिन होलिका दहन एक विशेष अपवाद है। शास्त्रों के अनुसार:

  • होलिका दहन भद्रा मुख में वर्जित है 
  • लेकिन भद्रा पुच्छ पूंछ में होलिका दहन किया जा सकता है 
  • यदि भद्रा पूर्णिमा के दिन ही समाप्त हो जाए, तो उसके बाद होलिका दहन करना अत्यंत शुभ माना जाता है

यही कारण है कि सही पंचांग और स्थानीय समय की गणना बेहद ज़रूरी हो जाती है।

होलिका दहन पर भद्रा का प्रभाव?

भद्रा का प्रभाव तभी नकारात्मक होता है जब:

  • अनुष्ठान गलत समय पर किया जाए 
  • पंचांग के नियमों की अनदेखी हो 
  • सूर्यास्त और तिथि का ध्यान न रखा जाए

गलत समय पर किया गया होलिका दहन मानसिक अशांति, पारिवारिक तनाव और आर्थिक रुकावटें ला सकता है। इसलिए World’s Best Astrologer से मार्गदर्शन लेना सबसे सुरक्षित विकल्प होता है।

ग्रहण काल में होलिका दहन नियम

ग्रहण काल में किसी भी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान करना वर्जित माना गया है। ग्रहण काल में:

  • होलिका दहन नहीं किया जाता 
  • पूजा-पाठ, मंत्र जाप और अग्नि कर्म रोके जाते हैं 
  • ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और शुद्धिकरण आवश्यक होता है

यदि होलिका दहन की तिथि पर ग्रहण पड़ता है, तो दहन ग्रहण समाप्ति और शुद्धिकरण के बाद ही किया जाना चाहिए।

भद्रा और ग्रहण में होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

जब भद्रा और ग्रहण दोनों का संयोग हो, तब सामान्य पंचांग पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में ध्यान रखा जाता है:

  • भद्रा मुख समाप्त हो 
  • ग्रहण काल पूरी तरह खत्म हो 
  • पूर्णिमा तिथि बनी रहे 
  • सूर्यास्त के बाद का समय हो

इसी जटिल गणना को सरल बनाते हैं Acharya Indu Prakash Ji, जो वर्षों से देश-विदेश में अपनी सटीक भविष्यवाणी और मुहूर्त ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं।

होलिका दहन कब नहीं करना चाहिए?

होलिका दहन इन परिस्थितियों में नहीं करना चाहिए:

  • भद्रा मुख के दौरान 
  • ग्रहण काल में 
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त होने के बाद 
  • बिना मुहूर्त जाने केवल परंपरा निभाने के लिए

गलत समय पर किया गया दहन शुभ फल नहीं देता, बल्कि अनचाही परेशानियाँ बढ़ा सकता है।

भद्रा समाप्ति के बाद होलिका दहन विधि

भद्रा समाप्त होने के बाद होलिका दहन विधि सरल लेकिन प्रभावशाली होती है:

  • स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें 
  • होलिका के चारों ओर परिक्रमा करें 
  • गोबर के उपले, लकड़ी और पूजन सामग्री अर्पित करें 
  • “ॐ नमः शिवाय” या “होलिकायै नमः” मंत्र का जाप करें 
  • परिवार की सुख-शांति की कामना करें

यह विधि नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मकता का संचार करती है।

Acharya Indu Prakash Ji से क्यों लें मार्गदर्शन?

Acharya Indu Prakash Ji को World’s Best Astrologer इसलिए कहा जाता है क्योंकि:

  • वे पंचांग , ग्रह और मुहूर्त की गहन गणना करते हैं 
  • भद्रा और ग्रहण जैसे जटिल योग में भी स्पष्ट समाधान देते हैं 
  • व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार पूजा-विधि बताते हैं 
  • उनके उपाय व्यावहारिक और शास्त्रसम्मत होते हैं

Book Appointment कर आप भी अपने लिए सही होलिका दहन मुहूर्त, पूजा विधि और आध्यात्मिक समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्ष

भद्रा और ग्रहण के बीच होलिका दहन संभव है, बस शर्त है सही समय, सही विधि और सही मार्गदर्शन। जब आस्था के साथ ज्ञान जुड़ता है, तब ही पर्व का वास्तविक फल मिलता है। इस होलिका दहन, परंपरा को डर नहीं, समझदारी और शास्त्र के साथ निभाइए, और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का स्वागत कीजिए।

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