
जीवन में स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह स्त्री के बिना पुरुष का जीवन अधूरा है, ठीक उसी तरह पुरुष के बिना स्त्री का जीवन भी अधूरा माना जाता है। विवाह केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि जीवनभर एक-दूसरे का सहारा बनने का वचन है।
हमारे सनातन धर्म में इस भाव को मजबूत करने के लिए कई व्रत और परंपराएँ बताई गई हैं। अशून्यशयन व्रत उन्हीं में से एक अत्यंत भावनात्मक और अर्थपूर्ण व्रत है।
अक्सर देखा जाता है कि महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए करवा चौथ जैसे व्रत रखती हैं, लेकिन शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि पुरुषों को भी अपनी पत्नी के दीर्घायु और दांपत्य सुख के लिए अशून्यशयन द्वितीया व्रत अवश्य करना चाहिए।
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अशून्यशयन का भावार्थ
अशून्यशयन का अर्थ है — ऐसा जीवन माँगना जिसमें कभी जीवन-साथी से बिछड़ना न पड़े।
अर्थात भगवान से यह प्रार्थना कि पति-पत्नी का साथ अंतिम सांस तक बना रहे।
हेमाद्रि और निर्णय सिंधु जैसे धर्मग्रंथों में इस व्रत को पति-पत्नी के संबंधों को मजबूत करने वाला बताया गया है। यह व्रत केवल पूजा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक संकल्प है — हम साथ रहेंगे।
अशून्यशयन व्रत कब किया जाता है?
यह व्रत श्रावण मास और भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है।
इस समय भगवान विष्णु का शयन काल होता है। मान्यता है कि इस व्रत के माध्यम से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के शयन उत्सव का स्मरण किया जाता है।
जिस प्रकार लक्ष्मी और नारायण कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते, उसी प्रकार यह व्रत करने वाले दंपत्ति के जीवन में भी अलगाव नहीं आता।
अशून्यशयन व्रत का महत्व
यह व्रत उन दंपत्तियों के लिए विशेष फलदायी माना गया है—
- जिनके जीवन में आपसी तनाव रहता है
- जिनके बीच भावनात्मक दूरी बढ़ रही हो
- या जो अपने वैवाहिक जीवन को और अधिक मधुर बनाना चाहते हों
मान्यता है कि इस व्रत को करने से—
- पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास बढ़ता है
- घर-परिवार में शांति बनी रहती है
- दांपत्य जीवन में स्थिरता आती है
- और पति के विधुर होने का योग नहीं बनता
अशून्यशयन व्रत की पूजा विधि
इस व्रत को सादगी और श्रद्धा के साथ करना सबसे उत्तम माना गया है।
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और दिनभर उपवास रखें।
संध्या के समय माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के चित्र या मूर्ति को सुंदर शैय्या पर स्थापित करें।
दूध और शहद से अभिषेक करें, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
भगवान को वस्त्र अर्पित करें, रोली-अक्षत से तिलक करें और पुष्प व फल चढ़ाएँ।
इस व्रत की विशेष बात यह है कि पूजा के समय मौन रहना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे मन की एकाग्रता और भाव की शुद्धता बनी रहती है।
अशून्यशयन व्रत के सरल और प्रभावी उपाय
- लक्ष्मी-नारायण के चित्र या मूर्ति पर पीपल के पत्तों की माला अर्पित करें
- माता लक्ष्मी को सौंदर्य सामग्री चढ़ाएँ
- किसी सिक्के पर इत्र लगाकर लक्ष्मी मंदिर में अर्पित करें
- लक्ष्मी मंदिर में चमेली का इत्र अर्पित करें
- पति-पत्नी मिलकर पक्षियों को बाजरा खिलाएँ
इन उपायों से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।
अंत में
अशून्यशयन व्रत केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते को आत्मा से जोड़ने वाला भाव है।
यह व्रत हमें याद दिलाता है कि सच्चा वैवाहिक सुख केवल साथ रहने में नहीं, बल्कि जीवनभर एक-दूसरे का हाथ थामे रखने में है।
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