
लकड़ी की चप्पलें यानि खडाऊ (Paduka) को अक्सर साधू संतों से जोड़ कर देखा जाता है| लेकिन ऐसा नहीं है, पहले के समय में खडाऊ आम लोगों द्वारा भी इस्तेमाल की जाती थी| इसे पहने के पीछे कुछ वैज्ञानिक कारन भी हैं जो सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ के लिए लाभदायक है|
वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो हमारे शारीर से हर समय निकलने वाली विद्युत तरंगे गुरुत्वाकर्षण की वजह से पृथ्वी में अवशोषित कर ली जाती हैं| अगर ऐसा होता रहे तो जीव की जैविक शक्तियाँ समाप्त हो जाती हैं| ऐसा होने से रोकने के लिए ही साधू संतों ने खडाऊ (Paduka) पहनने की प्रथा शुरू की ताकि हमारे शारीर और पृथ्वी में सम्पर्क न हो सके|
साथ ही इसके पीछे का धार्मिक कारन यह है की कईं धर्मों में चमड़े के जूते पहनना मान्य नहीं था| पर लकड़ी के चप्पल से किसी धर्म की मान्यताओं को ठेस नही पहुंचाता| उसके बाद लकड़ी की खडाऊ (Paduka) साधू संतों की पहचान बन गयी |
चमड़ा, कपड़ा, प्लास्टिक और फाइबर बनाम लकड़ी (Material Comparison)
प्राचीन समय में चमड़े (Leather) को जीव हिंसा से जोड़ा जाता था, इसलिए साधना और धार्मिक जीवन में इसे वर्जित माना गया।
कपड़े (Cloth) की चप्पलें जल्दी घिस जाती हैं और धरती की नकारात्मक ऊर्जा को रोकने में प्रभावी नहीं मानी जातीं।
वर्तमान समय में प्रचलित प्लास्टिक और फाइबर की चप्पलें शरीर को आराम तो देती हैं, लेकिन ये स्थैतिक विद्युत (Static Energy) को रोक कर शरीर में असंतुलन पैदा कर सकती हैं, जिससे थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ने की संभावना रहती है।
इसके विपरीत, लकड़ी (Wood) एक प्राकृतिक और जीवित तत्व मानी जाती है, जो न तो नकारात्मक ऊर्जा को शरीर में प्रवेश करने देती है और न ही शरीर की ऊर्जा को पूर्ण रूप से पृथ्वी में बहने देती है। यही कारण है कि लकड़ी की खडाऊ संतुलन, संयम और साधना का प्रतीक बनी।
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