समय पाय तरुवर फलहिं
यह जीवन अत्यंत सुंदर है और इसका हर एक क्षण अमूल्य है। हम सभी चाहते हैं कि जीवन का हर पल हमें आगे बढ़ाए, हमारे सपनों को साकार करे। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं।
ऐसे समय में अनंत सुख, सौ
भाग्य, राज-पाट, मान, पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित अनंता बंधन (अनंत सूत्र) अवश्य धारण करना चाहिए।
ईश्वर इस जगत में अनंत रूपों में विद्यमान हैं। भगवान विष्णु की अनंतता का बोध कराने वाला यह कल्याणकारी व्रत “अनंत चतुर्दशी” के रूप में मनाया जाता है। भारत के अनेक क्षेत्रों में इस व्रत की परंपरा है। पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत अनंत फल प्रदान करता है।
इस वर्ष अनंत चतुर्दशी का पर्व 15 सितंबर को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी होती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और संकटों से रक्षा करने वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है। व्रत के दिन नमक रहित भोजन करने का विधान है।
पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 06:09 बजे से पूरे दिन रहेगा।
अनंत चतुर्दशी व्रत की कथा
भविष्य पुराण के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना राज-पाट हारकर वन में भटक रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी। चतुर्मास में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं।
भगवान ने वामन रूप धारण कर केवल दो पगों में तीनों लोकों को नाप लिया था। जिनका न आदि है, न अंत — इसलिए वे अनंत कहलाते हैं। उनकी पूजा से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
युधिष्ठिर ने परिवार सहित यह व्रत किया और भगवान की कृपा से उन्हें अपना खोया हुआ राज-पाट पुनः प्राप्त हुआ। इसी व्रत के प्रभाव से पांडव सभी कष्टों से मुक्त हुए और महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त की।
अनंत सूत्र धारण करने की विधि
- पुरुष दाहिने हाथ में और स्त्रियां बाएं हाथ में अनंत सूत्र धारण करती हैं।
- यह पीले रंग का रेशमी धागा होता है, जिसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं।
- अनंत सूत्र घर पर बनाया जा सकता है या बाजार से खरीदा जा सकता है।
- शुद्ध, पवित्र और पूजित अनंत सूत्र हमारी कार्यालय सेवा से भी उपलब्ध कराया जाता है।
यह एक व्यक्तिगत व्रत है, इसका कोई सामाजिक या सामूहिक उत्सव नहीं होता। व्रत करने वाले को “ॐ अनंताय नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए।
अनंत चतुर्दशी का पर्व हिंदुओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसी दिन जैन धर्म के दशलक्षण पर्व का भी समापन होता है। जैन अनुयायी शोभायात्रा निकालते हैं और भगवान का जलाभिषेक करते हैं।
इस व्रत के प्रभाव से घर में धन-धान्य की वृद्धि, सुख-समृद्धि और सदैव कल्याण बना रहता है।
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