इस दिन ना जलाएं घर में चूल्हा

इस दिन ना जलाएं घर में चूल्हा, मिलेगा यह फल

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शीतला सप्तमी (Sheetla Saptmi) का पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में शीतला सप्तमी का व्रत 27 मार्च, बुधवार को रखा जाएगा। हालांकि कुछ क्षेत्रों में यह व्रत अष्टमी तिथि को भी मनाया जाता है।

यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शीतला सप्तमी का उद्देश्य शीतला माता की कृपा प्राप्त कर रोगों से रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि सुनिश्चित करना होता है।

शीतला सप्तमी पर ठंडे भोजन की परंपरा

शीतला माता को ठंडे भोजन का भोग अर्पित किया जाता है। इस कारण इस दिन एक दिन पूर्व बनाया गया भोजन ग्रहण किया जाता है। इसी वजह से इस व्रत को बसौड़ा, बसियौरा या बसोरा भी कहा जाता है।

इस दिन:

  • सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे जल से स्नान किया जाता है
  • शीतला माता के मंदिर में जाकर ठंडा जल अर्पित किया जाता है
  • श्रीफल (नारियल) और एक दिन पूर्व भिगोई गई चने की दाल चढ़ाई जाती है
  • घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता

शीतला सप्तमी की पूजा विधि

  • पूजा के बाद शीतला सप्तमी की कथा का श्रवण किया जाता है
  • घर लौटकर मुख्य द्वार के दोनों ओर हल्दी से पाँच–पाँच हाथों के छापे लगाए जाते हैं
  • माता को अर्पित जल में से थोड़ा जल घर लाकर पूरे घर में छिड़का जाता है, जिससे रोगों से रक्षा होती है
  • मान्यता है कि इससे शीतला माता की कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है

इस पावन व्रत को करने से पहले यदि आप अपनी जन्म कुंडली का गहन विश्लेषण (Kundli Analysis) किसी World’s best astrologer से करवा लेते हैं, तो व्रत का फल और भी अधिक प्रभावी माना जाता है।

क्यों मनाई जाती है शीतला सप्तमी? (पौराणिक कथा)

एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार शीतला सप्तमी के दिन एक परिवार में एक वृद्ध महिला और उसकी दो बहुओं ने व्रत रखा। परंपरा के अनुसार रात में ही भोजन बना लिया गया था, लेकिन हाल ही में माँ बनी दोनों बहुओं ने अपने बच्चों के डर से ताज़ा भोजन बना कर खा लिया

कुछ समय बाद दोनों बहुओं के नवजात शिशुओं की अचानक मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना से क्रोधित सास ने दोनों बहुओं को घर से निकाल दिया। दुखी बहुएँ अपने बच्चों के शव लेकर चल पड़ीं और रास्ते में विश्राम के दौरान उन्हें ओरी और शीतला नाम की दो बहनें मिलीं।

दोनों बहनें सिर में जुओं से परेशान थीं। बहुओं ने दया भाव से उनके सिर साफ किए। प्रसन्न होकर दोनों बहनों ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनकी गोद फिर से भर जाए। तब बहुओं ने अपने बच्चों की मृत्यु की कहानी सुनाई।

यह सुनकर शीतला माता ने कहा कि कर्मों का फल इसी जीवन में मिलता है। तब बहुओं को समझ आया कि ये कोई और नहीं बल्कि स्वयं शीतला माता हैं। दोनों ने माता से क्षमा माँगी और भविष्य में कभी ताज़ा भोजन न करने का संकल्प लिया।

माता प्रसन्न हुईं और दोनों बच्चों को पुनः जीवनदान दिया। तभी से शीतला सप्तमी का व्रत पूरे गाँव में श्रद्धा के साथ मनाया जाने लगा।

शीतला माता की कृपा से रोगों से रक्षा

शीतला माता को चेचक, त्वचा रोग और संक्रामक बीमारियों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से परिवार स्वस्थ रहता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

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