भाई दूज (Bhai Dooj) या भैया दूज, यम द्वितीया के नाम से जाना जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और अटूट प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, जो दीपावली के

दूसरे दिन पड़ती है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं, व
हीं भाई बहनों को उपहार देकर सदैव रक्षा का वचन देते हैं। यह परंपरा सदियों से हमारे समाज में भाई-बहन के रिश्ते को और मजबूत करती आई है।
भाई दूज का धार्मिक महत्व
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, जब कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि अपराह्न काल (दिन का चौथा भाग) में पड़ती है, तभी भाई दूज मनाने का शुभ समय होता है।
यदि द्वितीया तिथि दो दिनों तक रहे तो, जिस दिन अपराह्न में द्वितीया पड़ती है, उसी दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।
यह नियम पौराणिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी मान्य है, इसलिए हर वर्ष भाई दूज की सही तिथि पंचांग देखकर ही निर्धारित की जाती है।
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भाई दूज पर पारंपरिक रीति-रिवाज़
हिंदू संस्कृति में प्रत्येक त्यौहार कुछ विशेष विधियों और परंपराओं से जुड़ा होता है। भाई दूज पर भी बहनें अपने भाइयों के लिए खास तैयारी करती हैं:
- पूजा थाल की सजावट:
बहनें तिलक और आरती के लिए थाल सजाती हैं जिसमें कुमकुम, चावल, दीपक, फल, फूल, मिठाई और सुपारी रखी जाती है। - चावल से चौक बनाना:
तिलक से पहले, बहनें चावल से एक चौक बनाती हैं और भाई को उस पर बैठाकर पूजा प्रारंभ करती हैं। - तिलक और आरती:
शुभ मुहूर्त में बहनें भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर आरती करती हैं और उनके सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। - भेंट और आशीर्वाद:
तिलक के बाद भाई अपनी बहन को उपहार या शगुन देते हैं और उसकी रक्षा का वचन देते हैं।
भाई दूज से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
1. यमराज और यमुना की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सूर्य देव के पुत्र यमराज और यमुना देवी भाई-बहन थे। यमुना कई बार अपने भाई को घर आने के लिए आमंत्रित करती रहीं, लेकिन यमराज व्यस्तता के कारण नहीं जा सके।
एक दिन वे यमुना के घर पहुँचे। यमुना ने प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया, तिलक लगाया और भोजन कराया।
प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान मांगा — तब यमुना ने कहा,
“भाई, हर वर्ष इस दिन जो भी बहन अपने भाई का तिलक करेगी, उसे तुम्हारा भय नहीं रहेगा।”
यमराज ने यह वरदान स्वीकार किया और तब से यम द्वितीया (भाई दूज) का पर्व मनाया जाने लगा।
इस दिन यमुना नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे यम भय से मुक्ति और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
2. श्रीकृष्ण और सुभद्रा की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, भाई दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध करने के बाद द्वारका लौटकर अपनी बहन सुभद्रा से मुलाकात की।
सुभद्रा ने दीपक जलाकर, फल-मिठाइयों से उनका स्वागत किया और उनके माथे पर तिलक लगाया।
तब से यह परंपरा चली कि बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं और भाई उन्हें उपहार देते हैं।
भाई दूज का संदेश
भाई दूज केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, बल्कि यह परिवार में प्रेम, एकता और सुरक्षा के भाव को दृढ़ करने का उत्सव है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि चाहे जीवन में कितनी भी दूरियाँ क्यों न हों, भाई-बहन का रिश्ता हमेशा प्रेम और विश्वास से जुड़ा रहता है।
निष्कर्ष
भाई दूज का पर्व भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य परंपरा का प्रतीक है जहाँ रिश्ते धन या वस्तुओं से नहीं, बल्कि भावनाओं और आशीर्वादों से जुड़े होते हैं।
इस भाई दूज पर, अपनी बहन या भाई के साथ समय बिताइए, उनके प्रति अपने प्रेम को व्यक्त कीजिए और इस पावन दिन को स्नेह और हर्षोल्लास के साथ मनाइए।

