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आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना

आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है । आश्विन शुक्लपक्ष प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ ही भक्तों की आस्था का प्रमुख त्योहार शारदीय नवरात्र आरम्भ हो जाता है । मार्कण्डेय पुराण में शक्तियदुर्गाद्ध के नौ रुपों की चर्चा की गई है और नवरात्र में इनकी पूजा के विशेष फल बताए गए हैं । बुद्धिजीवियों को पुनीत यज्ञों के लिए, रक्षकों को भूमिपालन के लिए, व्यवसाइयों को धन के लिए, नौकरी पेशा लोगो को पुत्र और सुख के लिए, नारियों को सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस व्रत का महत्व बताया गया हैं. दुर्गा पूजा का पर्व सभी लोगों द्वारा किया जा सकता है अगर व्यक्ति 9 दिनो तक इस व्रत को न कर पाये तो वह आश्विन शुक्ल सप्तमी से इस व्रत का प्रारम्भ कर तीन दिनों  तक कर सकता है । इससे धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष पुरुषार्थों की भी प्राप्ति होती है । 

ध्वजारोपण. शारदीय नवरात्र के पहले दिन घर पर एक ध्वजा लगानी चाहिये ध्वजा की लम्बाई चैड़ाई गृह स्वामी के हाथ से सवा 2 हाथ लंबे और सवा 2 हाथ चैड़े एक कपड़े को लेकर बीच से उसे तिर्यक रेखा से काटकर तिकोनी ध्वजा बनानी चाहिये । ध्वजा सादी या ध्वजा में स्वस्तिकए मछली एवं एक ओंकार चित्र भी बना सकते हैं. ध्वजा के लिए गैरिक रंग यानि नारंगी रंग अच्छा माना गया है । इस प्रकार शारदीय नवरात्र के पहले दिन अपने घर पर ध्वजा फहराने से मनुष्य को सर्वत्र विजय मिलती है । मुकदमे में भी जीत होती है और समाज में सम्मान जनक स्थान प्राप्त होता है । लिहाजा शारदीय नवरात्र के पहले दिन घर पर ध्वजा जरुर लगानी चाहिए।

कलश स्थापना. हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा में सर्वप्रथम कलश स्थापना का बहुत ही महत्व मन जाता है । क्योंकि कलश को भगवान गणेश का रुप माना जाता है । कलश स्थापना करने के लिए आवश्यक सामग्री. मिट्टी, चांदी, तांबा या पीतल का पात्र, जौ, मिट्टी, गंगा जल, मौली, साबुत सुपारी, सिक्के, अशोक या आम के पत्ते, मिट्टी का ढक्कन कलश ढकने के लिए, साबुत चावल, एक नारियल पानी वाला लाल कपड़ा या चुनरी और फूल से बनी हुई माला । कलश स्थापित करने से पूर्व पूजा स्थल को साफ करके लकड़ी का पटरा रखकर उसके ऊपर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर गणेश जी का स्मरण करते हुए कपड़े पर थोड़ा.थोड़ा चावल रखना चाहिए फिर जौ को मिट्टी के पात्र मे मिट्टी डालकर बोना चाहिए और जल से भरे कलश पर ऊँ और स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उस पर स्थापित कर कलश में सुपारी, सिक्का डालकर उसके मुख पर रक्षा सूत्र बांधकर आम या अशोक के पत्ते रख ढक्कन से कलश के मुख को ढंक कर उसमे चावल भर देना चाहिये अब नारियल को चुनरी में लपेटकर देवताओं का आवाहन करते हुये ढक्कन के ऊपर रखकर दीप जलाकर कलश की पूजा मिठाइयां और फूल चढ़ाकर करें फिर लकड़ी के पटरे पर लाल आसन बिछा कर उस पर माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और नौ दिन तक इसी प्रकार स्थापित रहने दें और प्रतिदिन सुबह शाम दीपक जलाये व आरती करें माँ को फूलदार इलाइची, लौंग, फलए मिठाई का भोग लगाना चाहिए । लौंग का जोड़ा माँ को अति प्रिय है । यदि सम्भव हो सके तो नौ दिन अखण्ड ज्योति जलायें ये ज्योति देशी घी की या फिर तिल के तेल से भी जला सकते है ।

1- शैलपुत्री. 

मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है । नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं । हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है । अत: इस दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए । शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है । हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है । स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है ।

उपाय. शैलपुत्री माँ को गाय का घी और मिश्री चढ़ाने से भूमि और भवन की उपलब्धि प्राप्त होती है । आज कन्याओ को श्रृंगार सामग्री, सुगंधित और ताजा लाल फूल भेंट करने से वाहन सुख प्राप्त होगा ।

मां को गाय के घी का भोग लगाएं और दान करें । इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है और बीमारी दूर होती है ।

2- ब्रह्मचारिणी

दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है इन्हें ब्रह्म शक्ति यानि तप की शक्ति का प्रतीक मन जाता हैं । इनकी आराधना से शिक्षा और व्यवसाय में सफलता मिलता हैं । साथ ही सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं । अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है ।

उपाय- द्वितीया तिथि यानी नवरात्रि के दूसरे दिन माता को शक्कर का भोग लगाएं तथा उसका दान करें । इससे साधक को लंबी उम्र प्राप्त होती है । इस दिन 45 जोड़ा लौंग कपूर के साथ गुलाब के पत्ते पर रखकर आहुती देने से विद्या के क्षेत्र में सफलता हासिल होगी । आज के दिन 11 कन्याओं को मीठे फल दान करने से व्यवसाय में वृद्धि होगी । 

3- चंद्रघंटा 

नवरात्रि का तीसरा दिन माता चंद्रघंटा को समर्पित है । देवी चंद्रघंटा को दुर्गा का उग्र रुप कहा गया है । यह शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप भी है । इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है । असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था । इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतरू प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है ।

उपाय- तृतीया तिथि को माता को दूध चढ़ाएं तथा इसका दान करें । ऐसा करने से सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलती है । इस दिन प्रसाद के रुप मे गाय के दूध से बनी खीर चढ़ाने से समस्त दुखों से मुक्ति मिलती है और शीघ्र ही सभी कष्टों का निवारण होता है । आज पूजन के बाद कन्याओं को खीर, हलवा या स्वादिष्ट मिठाई भेंट करने से देवी माँ प्रसन्न होती है । 

4- कुष्मांडा

नवरात्रि के चौथे दिन की प्रमुख देवी मां कुष्मांडा हैं । मां दुर्गा के इस चतुर्थ रूप ने अपने उदर से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया । इसी वजह से दुर्गा के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा । मां कुष्मांडा के पूजन से हमारे शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है । इनकी उपासना से हमारे समस्त रोग व शोक दूर हो जाते हैं । साथ ही भक्तों को आयुए यशए बल और आरोग्य के साथण्साथ सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुख भी प्राप्त होते हैं । पूजन मे माँ को लाल फूल चढ़ाने से माँ प्रसन्न होती है और धन व सुख.समृद्धि का वरदान देती है ।

उपाय- चतुर्थी तिथि को माता को मालपूआ चढ़ाएं व गरीबों को दान कर दें । इससे सभी प्रकार की समस्याएं स्वतर: ही समाप्त हो जाती हैं और सुख.समृद्धि की प्राप्ति होती है । इस दिन कन्याओं को रंग बिरंगे रिबनए वस्त्र भेंट मे देने से धन की वृद्धि होती है । 

5- स्कंदमाता

धर्म शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि की पंचमी तिथि को स्कंदमाता की पूजा की जाती है । देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जानते हैं । स्कंदमाता की पूजा-आराधना करने से साधक परम शांति व सुख का अनुभव कराता है तथा सैन्य संचालन की शक्ति भी मिलती हैं ।

उपाय- पंचमी तिथि यानी नवरात्रि के पांचवे दिन माता दुर्गा को केले का भोग लगाएं व गरीबों को केले का दान करें । इससे आपके परिवार में सुखण्शांति रहेगी ।

6- कात्यायनी 

नवरात्रि के छठे दिन आदिशक्ति श्री दुर्गा के छठे रूप कात्यायनी की पूजा-अर्चना का विधान है । महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था । इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं । इस दिन उपासना करने से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती हैं । वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं ।

उपाय- षष्ठी तिथि यानी छठे दिन माता दुर्गा को शहद का भोग लगाएं व इसका दान भी करें । इससे धन आगमन के योग बनते हैं ।

7- कालरात्रि

नवरात्रि के सातवे दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है । इनके आराधना से भानु चक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है । शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती है ।

उपाय- सप्तमी तिथि को माता को गुड़ से बने पकवानों का भोग लगाएं तथा दान भी करें । इससे दरिद्रता का नाश होता है ।

8- महागौरी 

आदिशक्ति श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं ।  महागौरी की आराधना से ललाट में स्थित सोम चक्र जागृत होता हैं और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती है । मां महागौरी के प्रसन्न होने पर भक्तों को सभी सुख स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं । साथ ही इनकी भक्ति से हमें मन की शांति भी मिलती है ।

उपाय- अष्टमी तिथि के दिन माता दुर्गा को नारियल का भोग लगाएं तथा नारियल का दान भी करें । इससे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।

9- सिद्धिदात्री 

नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है । मां सिद्धिदात्री भक्तों को हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं । सिद्धिदात्री के आशीर्वाद के बाद श्रद्धालु के लिए कोई कार्य असंभव नहीं रह जाता और उसे सभी सुख-समृद्धि प्राप्त हो जाते हैं ।

उपाय- नवमी तिथि के दिन माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं व यथाशक्ति गरीबों में दान करें । इससे लोक -परलोक में आनंद व वैभव मिलता है ।

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