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अहोई अष्टमी से होगा सन्तान का कल्याण

अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) के पर्व पर माताएं अपने पुत्रों के कल्याण के लिए अहोई माता व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप में यह व्रत केवल पुत्रों के लिए रखा जाता था प्ररन्तु अपनी सभी संतानों के कल्याण के लिए आजकल यह व्रत रखा जता है। माताएं, बहुत उत्साह से अहोई माता की पूजा करती हैं तथा अपनी संतानों की दीर्घ, स्वास्थ, एवं मंगलमय जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। तारों अथवा चंद्रमा के दर्शन तथा पूजन कर व्रत समाप्त किया जाता है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

यह व्रत संतानहीन युगल के लिए महत्वपूर्ण है अथवा जो महिलाएं गर्भधारण में असमर्थ रहती हैं अथवा जिन महिलाओं का गर्भपात हो गया हो, उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए अहोई माता व्रत करना चाहिए। इसी कारण से इस दिन को कृष्णा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मथुरा के राधा कुंड में इस दिन बड़ी संख्या में युगल तथा श्रद्धालु पावन स्नान करने आते हैं। इसके अलावा जो विवाहित महिलाएं संतान की प्राप्ति चाहती हैं उनके लिए अहोई अष्टमी का व्रत बहुत मायने रखता है. इसलिए ही मथुरा के राधा कुंड में लाखों श्रद्धालु इस दिन स्नान करने के लिए पहुंचते हैं। इस वर्ष अहोई अष्टमी 21 अक्टूबर को मनाई जाएगी. अहोई अष्टमी के दिन अहोई माता को पूजा जाता है और शाम को चांद तारों को अर्घ्य देने के बाद पूजां संपन्न हो जाती है।

अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami) उघापन विधि

जिस स्त्री का पुत्र न हो अथवा उसके पुत्र का विवाह हुआ हो, उसे उघापन अवश्य करना चाहिए. इसके लिए, एक थाल मे सात जगह चार-चार पूरियां एवं हलवा रखना चाहिए. इसके साथ ही पीत वर्ण की पोशाक-साडी एवं रूपये आदि रखकर श्रद्धा पूर्वक अपनी सास को उपहार स्वरूप देना चाहिए. उसकी सास को चाहिए की, वस्त्रादि को अपने पास रखकर शेष सामग्री हलवा-पूरी आदि को अपने आस-पडोस में वितरित कर दे। यदि कोई कन्या हो तो उसके यहां भेज दे।

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