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रति काम महोत्सव – उत्सव प्रेम का

शास्त्रों में कामदेव के शरीर के अलग-अलग भागों को विभिन्न संज्ञाएं दी गई हैं । कामदेव के नयनों को बाण या तीर, भौहों को कमान की संज्ञा दी है । ये शांत होती हैं, लेकिन इशारों में ही अपनी बात कह जाती हैं। बसंत पंचमी से होली तक का समय रतिकाम महोत्सव कहा गया है | बसंत बर्फ के पिघलने और अंखुओं के फूटने की खास ऋतु है । यह ऋतु ही नहीं अपितु  ऋतुराज है यानि ऋतुओं का राजा । बसंत कामदेव का मित्र है। कामदेव ही सृजन को संभव बनाने वाले  देवता हैं । अशरीरी होकर वह प्रकृति के कण-कण में समाहित हैं । बसंत उस सब को  सरस अभिव्यक्ति प्रदान करता है। सरसता अगर किसी ठूँठ में भी छिपी हो, बसंत उसमें ऊर्जा का भण्डार भर देता है जो कि हरीतिमा बनकर प्रकट होती है। बसंत उत्सव है संपूर्ण प्रकृति की प्राणवंत ऊर्जा के विस्फोट का ।

सूर्य के कुम्भ राशि में रहने के दौरान ही रति-काम महोत्सव प्रारंभ हो जाता है। इस महोत्सव का वर्णन तमिल संगम साहित्य में भी मिलता है । यह साहित्य पहली ईस्वी पूर्व में लिखा गया था। यही नहीं, यह पर्व बसंत के आने का सूचक भी माना जाता है । बसंत के इस मौसम पर ग्रहों में सर्वाधिक विद्वान ‘शुक्र’ का प्रभाव रहता है । शुक्र, काम और सौंदर्य के कारक हैं, इसलिए रति-काम महोत्सव की यह अवधि कामोद्दीपक होती है। रति दक्ष प्रजापति की पुत्री और कामदेव की पत्नी है । ऐसा कहा जाता है कि रति का जन्म दक्ष प्रजापति के पसीने से हुआ था । शास्त्रों में रति को ब्रह्मांड की सबसे सुन्दर स्त्री माना जाता है । रति के पति कामदेव को हिंदू शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता माना गया है । उनका स्वरुप युवा और आकर्षक है । बसंत, कामदेव के मित्र कहे जाते हैं, इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है । इस धनुष की कमान स्वर विहीन होती है, यानि कामदेव जब अपनी कमान से तीर छोड़ते हैं तो उसकी आवाज नहीं होती । इसका अर्थ है कि काम में शालीनता जरुरी है। तीर कामदेव का सबसे महत्वपूर्ण शस्त्र है। इस तीर के तीन दिशाओं में तीन कोने होते हैं, जो क्रमशः तीन लोकों के प्रतीक माने गए हैं। इनमें एक कोना ब्रह्मा जी के आधीन है जो कि सृष्टि के निर्माण का प्रतीक है । दूसरा कोना विष्णु जी के आधीन है, जो ओंकार या उदर पूर्ति (पेट भरने) के लिए होता है। यह मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देता है। कामदेव के तीर का तीसरा कोना महेश (शिव) के आधीन होता है, जो मोक्ष का प्रतीक है । कामदेव के धनुष का लक्ष्य विपरीत लिंगी होता है। इसी विपरीत लिंगी आकर्षण से बंधकर पूरी सृष्टि संचालित होती है । शास्त्रों में कामदेव के शरीर के अलग अलग भागों को विभिन्न संज्ञाएं दी गई हैं । कामदेव के नयनों को बाण या तीर की संज्ञा दी गई है । उनकी भौहों को कमान की संज्ञा दी गई है । ये शांत होती हैं, लेकिन इशारों में ही अपनी बात कह जाती हैं । इन्हें किसी सहारे की आवश्यकता नहीं होती । कामदेव का माथा धनुष के समान है, यह दिशा निर्देश देता है। हाथी को कामदेव का वाहन माना गया है। लेकिन कुछ शास्त्रों में तोते को भी कामदेव का वाहन बताया गया है । अनंग त्रयोदशी के दिन भगवान कामदेव और भगवती रति की दिव्य मूर्ति बनाकर, फूलों से सजाकर, पांच बाण हाथ में देकर उनकी पूजा की जाती है और इनकी पूजा का दिन, यानि अनंग त्रयोदशी को ही रतिकाम महोत्सव के रुप में मनाया जाता है।

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