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मित्र सप्तमी व्रत करने से होंगे सूर्य देवता प्रसन्न

मित्र सप्तमी का त्योहार मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन मनाया जाता है। भगवान सूर्य की आराधना करते हुए लोग गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे सूर्य देव को अर्घ देते हैं। पौराणिक महत्व के अनुसार सूर्य देव को महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र कहा जाता है। मित्र सप्तमी का व्रत करने से सूर्य भगवान प्रसन्न हो कर उसके सारे दुखों को हर लेते है और घर में धन धान्य की वृद्धि साथ ही सुख समृद्धि का आगमन होता है। इस व्रत से सभी प्रकार के रोगों (चर्म तथा नेत्र रोग) दूर होते है तथा दीर्घआयु की प्राप्ति होती है। इस दिन सभी को सूर्य की किरणों को जरुर ग्रहण करना चाहिए। यह स्वास्थ के लिये विशेष फलदाई है। इस दिन फल, दूध, केसर, कुमकुम बादाम इत्यादि से सूर्य देव की पूजा की जाती है। इस दिन स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। मित्र सप्तमी के व्रत से मनुष्य कठिन कार्यों को भी संभव बनाने की ताकत रखता है और शत्रु को भी मित्र बनाने की क्षमता रखता है। एक बार एक राजा ने सपना देखा कि कोई साधु उससे कह रहा है कि कल रात एक विषैले सांप के ड़सने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है। सपने की बात से घबराया राजा अपनी आत्मरक्षा के लिए उपाय ढूंढने मे लग गया सोचते-सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई उपाय नहीं अतः उसने पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह-जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो उसे किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाने की कोशिश न की जायें। रात को सांप अपनी बांबी से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल पड़ा। वह जैसे आगे बढ़ता गया, मार्ग मे अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, उसका क्रोध कम होता गया क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव बढ़ने लगे। राजमहल मे प्रहरी और द्वारपाल उसे हानि नहीं पहुंचा रहे है। यह दृश्य देखकर सांप के मन में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। सदव्यवहार, नम्रता, मधुरता के व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुआ। राजा के पास पहुंचने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं पूर्व जन्म का बदला लेने आया था, परन्तु आपके सदव्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरुप अपनी बहुमूल्य मणि तुम्हें दे रहा हूं|

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