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कीजिये स्कंद षष्ठी का व्रत : अच्छी नोकरी प्राप्त होगी |

अगर आप लंबे समय से संतान सुख से वंचित हैं। घर में कोई संतान न होने से निराश और हताश महसूस कर रहे हैं या आपकी नौकरी छूट गई है तो ये आपके लिये विशेष है। इस दिन स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जायेगा। यह व्रत आपके लिये किसी वरदान से कम नहीं |

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जाता है । इस दिन कार्तिकेय भगवान का जन्मदिन माना जाता है। इसीलिये इसे स्कंद षष्ठी कहा गया है। इस व्रत का एक नाम संतान षष्ठी भी है। वैसे तो इस व्रत की परंपरा दक्षिण भारत के राज्यों में ज्यादा है लेकिन अब उत्तर भारत में भी इसका चलन बढ़ता जा रहा है। भगवान शिव के बड़े पुत्र, षष्ठी तिथि, दक्षिण दिशा और मंगल ग्रह के स्वामी, देवताओं के सेनापति कार्तिकेय मल्लिकार्जुन में ही निवास करते हैं। इसे दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा जाता है। मल्लिका का मतलब है माता पार्वती और अर्जुन का अर्थ है शिव। जहां शिव, वहां शक्ति। दोनों ही यहां विराजमान हैं। दोनों भाइयों में पहले विवाह करने को लेकर विवाद होने के कारण कार्तिकेय अपने माता-पिता और छोटे भाई गणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत छोड़ कर मल्लिकार्जुन चले आए थे। इसी दिन कार्तिकेय ने शिवभक्त दैत्यराज तारकासुर का वध किया था। इसी तिथि को कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने थे। ऐसा माना जाता है कि जिस राजा का राज्य छिन गया हो, वह अगर यह व्रत करे तो उसे पुनः राज्य प्राप्त हो जाता है। व्रत करने वालों को दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके भगवान कार्तिकेय को घी, दही, पुष्पों और जल से अर्घ प्रदान करना चाहिए। चंपा के फूल उन्हें बेहद पसंद हैं, शालिग्राम भगवान का विग्रह, कार्तिकेय जी की प्रतिमा या फोटो, तुलसी का पौधा, तांबे का लोटा, नारियल, कुंकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन अबीर, गुलाल, दीपक, इत्र, दूध, जल, मौली जैसी पूजन सामग्री होनी चाहिए। भगवान को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है। साथ ही व्रती को रात में जमीन पर ही शयन करना चाहिए। इसमें साधक तंत्र साधना भी करते हैं, इसमें मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। भविष्यपुराण के अनुसार दक्षिण में भगवान कार्तिकेय के मंदिरों के इस दिन दर्शन करना बहुत शुभ होता है। इस दिन तेल का सेवन नहीं करना चाहिए। पूजा का मंत्र इस प्रकार है- ‘देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते।

पुराणों मे कार्तिकेय मल्लिकार्जुन का देवसेना और वल्यिम्मा से विवाह का वर्णन मिलता है। मोर इनका वाहन है इनकी पूजा करने वाला युद्ध में विजयी होकर सेनापति, राजनीति में उच्चपद प्राप्त करता है। वैदिक ज्योतिष में मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन लग्न वाले अगर इनकी पूजा करें तो उन्हें चमत्कारी लाभ होगा। जिन लोगों की जन्मकुंडली में मंगल मेष, वृश्चिक और मकर राशि का है तो निश्चित ही उन्हें भगवान कार्तिकेय का आशीर्वाद मिलता है। स्कन्द पुराण भगवान कार्तिकेय के नाम पर है। इसमे भगवान कार्तिकेय मल्लिकार्जुन के 108 नामों का उल्लेख मिलता हैं। जिसमे स्कंद षष्ठी, चंपा षष्ठी, मुल्करुपिणी षष्ठी, सुब्रहमत्य षष्ठी, आदि नाम प्रसिद्ध है।

स्कंद षष्ठी व्रत से च्यवन ऋषि के नेत्रों में ज्योति आई थी। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार प्रियव्रत का मृत शिशु इसी व्रत से जीवित हो उठा था। कार्तिकेय भगवान के 6 मुख हैं और 6 कृतिकाओं ने इन्हें दूध पिलाकर इनकी रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि गंभीर रुप से बीमार बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिये भी यह व्रत रखना चाहिए|

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