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वरूथिनी एकादशी व्रत – यह व्रत कर के लीजिये कन्यादान का लाभ

जीवन में कन्यादान का बहुत अधिक महत्व है । जिस घर में कन्या नहीं है लेकिन वो कन्यादान का लाभ लेना चाहते हैं तो उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए |

वरूथनी शब्द संस्कृत भाषा के वरूथिन से बना है, जिसका मतलब होता है- प्रतिरक्षक, यानि रक्षा करने वाला । चूंकि यह एकादशी सब दुःखों और कष्टों से भक्तों की रक्षा करती है इसीलिए वैशाख कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को वरूथनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी लोक-परलोक में साधक को सौभाग्य प्रदान करने तथा भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती है । कहते हैं इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को कई हजार सालों की कठिन तपस्या करने के समान फल की प्राप्ति होती है । संयम व शुद्ध आचरण का पालन करते हुए इस दिन प्रातः समस्त क्रियाओं से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का विधि-पूर्वक पूजन और व्रत करना चाहिए । वरूथिनी एकादशी के व्रत से अन्नदान तथा कन्यादान के समान पुण्य मिलता है । शास्त्रों में इस दिन घोड़े के दान से श्रेष्ठ हाथी का दान बताया गया है। हाथी के दान से भूमि का दान, भूमि से तिल दान, तिल से स्वर्ण दान तथा स्वर्ण के दान से अन्न का दान श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि अन्न दान के बराबर कोई दान नहीं होता । अन्नदान से देवता, पितर और मनुष्य तीनों तृप्त हो जाते हैं । एकादशी के दिन पान खाना, दातुन करना, परनिंदा या चुगली करना तथा दुष्ट प्रवृत्ति के मनुष्यों के साथ बातचीत सब त्याग देना चाहिए। साथ ही क्रोध, मिथ्या भाषण का भी त्याग करना चाहिए । इस व्रत में नमक, तेल, चावल व अन्न वर्जित है ।

वरूथिनी एकादशी का व्रत करने वालों को दशमी के दिन से निम्नलिखित वस्तुओं का त्याग करना चाहिए-

1. कांसे के बर्तन में भोजन करना

2. दूसरी बार भोजन करना

3. मसूर की दाल

4. चने का साग

5. करोदों का साग

6. मधु (शहद)

7. मांस-मछली का त्याग

8. नमक व तेल का त्याग

9. वैवाहिक जीवन में संयम.

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