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याज्ञवल्कय जयंती – कौन थे याज्ञवल्कय, क्यों उन्हें याज्ञिक सम्राट कहा जाता है |

ब्रह्मज्ञानी, महान अध्यात्मवेत्ता, अच्छे वक्ता, योगी, धर्मात्मा और तेजस्वी युग दार्शनिक जैसे गुणों से भरपूर याज्ञवल्कय जी भारतीय ऋषियों की परंपरा के अग्रणी ऋषि हुए हैं । याज्ञवल्कय जी के जन्म दिवस को प्रतिवर्ष याज्ञवल्कय जयंती के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है । याज्ञवल्कय महर्षि वैशम्पायन के शिष्य होने के साथ ही राजा जनक के प्रमुख सलाहकारों में से एक थे । गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘श्री रामचरितमानस’ के एक प्रसंग में भी इनके नाम का उल्लेख दिया गया है । पुराणों में याज्ञवल्कय को ब्रह्मा जी का अवतार माना गया है, जिस कारण इन्हें ब्रह्मर्षि भी कहा जाता है । इनके पिता ब्रह्मरथ, जिन्हें ‘वाजसनी’ और ‘देवरथ’ के नाम से भी जाना जाता है, वेद-शास्त्रों के परम ज्ञाता थे और इनकी माता देवी सुनन्दा ऋषि सकल की पुत्री थी । महर्षि याज्ञवल्कय के यज्ञों में सबसे अधिक निपुणता होने के कारण उन्हें ‘याज्ञिक सम्राट’ भी कहा जाता है । याज्ञवल्कय जी को भगवान सूर्य देव का वरदान प्राप्त था और इसी वरदान के फलस्वरुप ऋषि याज्ञवल्कय शुक्ल यजुर्वेद या वाजसनेयी संहिता के आचार्य भी बने और इसलिए उन्हें ‘वाजसनेय’ के नाम से भी जाना जाता है । महान स्मृतियों में ‘मनुस्मृति’ के बाद ‘याज्ञवल्कय स्मृति’ को ही याद किया जाता  है। महर्षि याज्ञवल्कय द्वारा रचित शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद्, ईशोपनिषद, प्रतिज्ञासूत्र, याज्ञवल्कय स्मृति, योग याज्ञवल्कय आदि ग्रन्थ हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की अमूल्य निधि हैं । महर्षि याज्ञवल्कय की जयंती के अवसर पर पूरे भारतवर्ष में पूजा एवं सभाओं का आयोजन किया जाता है ।

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