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क्या है कर्मयोग, क्यों है ये सर्वोच्च ज्ञान 

भगवान् कृष्ण ने गीता में चार प्रकार के योगों का वर्णन किया है- ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और राजयोग | जिसमें कर्मयोग को सर्वोच्च बताया है |

मनुष्य जन्म से मृत्यु तक निरंतर मानसिक और शारीरिक क्रियाएं करता रहता है जिन्हें कर्म कहते है | ये क्रियाएं दो प्रकार की होती है- ऐच्छिक और अनैच्छिक | अनैच्छिक क्रियाएं वो क्रियाएं है जिनमें हमारा बस नहीं चलता है जैसे छींकना, श्वास लेना, ह्रदय की धड़कन आदि और ऐच्छिक क्रियाएं वो क्रियाएं है जिन्हें करने या न करने में हमारा बस चलता है जैसे पूजा-पाठ, खाना, चलना, रोना, हसना आदि |

इन ऐच्छिक क्रियाओं को को दो भागों में विभक्त किया गया है –

पहली जो क्रियाएँ या कर्म सोच-समझकर ज्ञानसहित अथवा विवेकपूर्वक किये गये हैं,

दुसरी वो क्रियाएँ या कर्म जो कि भूलवश या अज्ञानवश अथवा दबाव में किये गये हों |

व्यवहार की दृष्टि से कर्मों को तीन भागों में बांटा गया है-

  1. नित्य कर्म

  2. नैमित्तिक कर्म

  3. काम्य कर्म

नित्य कर्म – वे उत्तम परिशोधक कर्म हैं, जिन्हें प्रतिदिन किया जाना चाहिये। जैसे – शुद्धि कर्म, उपासना परक कर्म आदि |

नैमित्तिक कर्म – वे कर्म हैं, जिन्हें विशिष्टि निमित्त या पर्व को ध्यान में रखकर किया जाता है जैसे विशिष्ट यज्ञ कर्मादि – अश्वमेध यज्ञ, पूर्णमासी यज्ञ(व्रत) आदि |

काम्य कर्म – वे कर्म हैं जिन्हे कामना या इच्छा के वशीभूत होकर किया जाता है | इस कामना में यह भाव भी समाहित रहता है कि कर्म का फल भी अनिवार्य रूप से मिले इसीलिये इन्हें काम्य कर्म कहा गया है | इसे सकाम कर्म भी कहते है |

यह सकाम कर्म ही हमें सुखी या दुखी करता है। इसके विपरीत निष्काम है, जिसमें फल की कामना और कर्म की लालसा, कर्म करने से पहले, कर्म करते हुए और कर्म करने के बाद लेशमात्र भी नहीं रहती है। इसमें व्यक्ति, प्रभु में मन लगाकर कर्म करता रहता है। निष्काम कर्म में व्यक्ति के अंदर अपना या अपने लोगों का स्वार्थ नहीं रहता, क्योंकि निष्काम अहंकार से ऊपर उठने की प्रक्रिया है। यही कर्मयोग का मार्ग है | भगवान् कृष्ण ने गीता में कहा भी है –

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात कर्तव्य कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं इसलिए तू कर्म, फल पाने की आशा से मत कर और न ही, कर्म ना करने की चेष्टा कर |

यही कर्मयोग का मूल मंत्र है | भगवान् कृष्ण ने इस कर्मयोग रुपी ज्ञान को सबसे पहले सूर्य को दिया और सूर्य ने मनु को व मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया | जिसका वर्णन गीता में किया गया है–

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌

  गीता (अध्याय-4,श्लोक-1)

मनुष्य को सभी परिस्थितियों में सम रहना चाहिए | क्योंकि जब हम किसी चीज से ज्यादा उम्मीद करते है और वो पूरी नहीं होती है तो निराश हो जाते है | इस निराशा की वजह से मनुष्य अपने कर्म के मार्ग से कई बार भटक जाता है | गीता में कहा भी गया है –

समत्वं योग उच्यते

अर्थात समत्व योग उत्तम है | हार-जीत, सफलता-विफलता आदि सभी में सम भाव के साथ जीवन यापन करना ही समत्व है | जो लोग निष्काम भाव से कर्म करते है और सभी परिस्थितियों में सामान्य रहते है भगवान् कृष्ण ने ऐसे लोगों को महापुरुष बताया है |

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥

(अध्याय-4, श्लोक-19)

इस प्रकार देखें तो हमें दुनिया में सभी प्रकार के सांसारिक कर्म करते रहना चाहिए किन्तु उन पर इतना आसक्त नहीं होना चाहिए कि उनसे हमें दुःख मिलने लगे |

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