मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम भारतवासियों के दिल में बसते हैं । भगवान श्री राम के जीवन से जुड़े कहे अनकहे सत्य भारत देश की पवित्र भूमि पर अनेकों जगह मिलते हैं। ऐसी ही कुछ जगहों के बारे में हम आपको बता रहे हैं जो आपको भगवान राम के इतिहास से अवगत कराती है।

अयोध्या नगरी हिंदुओं के सात प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। उत्तर प्रदेश की इस अयोध्या नगरी में आज से 7128 वर्ष पूर्व अर्थात् 5114 ईस्वी पूर्व में श्री राम का जन्म हुआ थी। रामायण से पता चलता है कि सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्या नगर को स्वयं भू ‘मनु’ ने बसाया था । इस नदी के किनारे 14 प्रमुख घाट हैं । इनमें गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । अयोध्या नगरी में प्रति वर्ष मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त तथा अक्टूबर नंवबर के महीनों में तीन मेले लगते हैं । इसके अलावा अयोध्या में कनक महल के बारे में कहा जाता है कि माता कैकेई ने सीता मैया को विवाह के समय मुंह दिखाई में दिया था । उस समय यह अयोध्या के सबसे सुंदर महलों में से एक था । यहां रखी राम और सीता की मूर्तियों के बारे में कहा जाता है कि त्रेतायुग में जब प्रभु राम धरती से वापस लौट गए थे तो उनके पुत्र कुश ने इस महल में उनकी मूर्तियां स्थापित की थी और आज यह महल एक मंदिर के रूप में स्थापित है।
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श्री सीतारामचंद्र स्वामी मंदिर (भद्राचलम)- भगवान श्री राम का यह मंदिर आंध्रप्रदेश के खम्मण जिले के भद्राचलम शहर में स्थित है । यह मंदिर श्री राम के साथ-साथ सीता मैया को भी समर्पित है।भद्राचलम, पर्णशाला गांव से केवल 35 कि.मी की दूरी पर है और पर्णशाला उन जगहों में से एक है जहां भगवान श्री राम ने अपने वनवास के कुछ समय बिताए थे । राम जब लंका से मैया सीता को बचाने के लिए गए थे, तब वे गोदावरी नदी को पार कर इसी स्थान पर रूके थे । यह मंदिर ठीक उसी जगह पर बनाया गया है, जहां से श्री राम ने नदी को पार किया था । पहले यहां पर बांस का मंदिर बना हुआ था, लेकिन मध्यकाल में रामभक्त कंचली गोपन्ना नामक एक तहसीलदार ने प्राचीन मंदिर के स्थान पर पत्थरों का भव्य मंदिर ‘श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर’ बनवाया । तत्पषचात् लोग इन्हें रामदास कहकर पुकारने लगे ।
हरिहरनाथ मंदिर (सोनपुर)- इस हरिहरनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान श्री राम ने सीता स्वयंवर के लिये जनकपुर जाते वक्त त्रेतायुग में करवाया था। यह मंदिर बिहार के सोनपुर में गंडक नदी के किनारे स्थित है । हरिहर दो शब्दों का मेल है हरि, यानि भगवान विष्णु और हर, यानि शिव जी । हालांकि वर्तमान में स्थित मंदिर का निर्माण तत्कालीन राजा राम नारायण ने करवाया था । हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां नदी में स्नान करने से सौ गोदान के समान फल प्राप्त होता है । सोनपुर में एशिया का सबसे प्रसिद्ध मेला भी लगता है। पूरी दुनिया में हरिहरनाथ का यह मंदिर इकलौता ऐसा मंदिर है जहां हरि (विष्णु) और हर(शिव) की एकीकृत मूर्ति स्थापित है ।
चित्रकूट का राम मंदिर- यह मंदिर हिंदूओं के बड़े तीर्थस्थलों में से एक है । सीतापुर, कामता, खोही, नया गांव और कर्वी के आस-पास का सारा वनक्षेत्र चित्रकूट के नाम से जाना जाता है। यह वही चित्रकूट है जहां श्री राम ने माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के पूरे साढ़े ग्यारह वर्ष अलग-अलग जगहों पर बिताए थे । चित्रकूट के इस नाम के पीछे भी एक वजह है । चित्रकूट दो शब्दों से मिलकर बना है चित्र और कूट । यहां चित्र का मतलब है अशोक और कूट का मतलब है चोटी । क्योंकि इस वनक्षेत्र में किसी समय अशोक के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे इसलिए इस जगह का नाम चित्रकूट पड़ा ।
सतना में रामवन- चित्रकूट में विश्राम के बाद अत्रि ऋषि के आश्रम से होते हुए भगवान श्रीराम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे। यहां उन्होंने नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे कई ऋषियों के आश्रम मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम आदि का भ्रमण किया । सतना जिले के बिल्कुल हृदय में रामवन बसा हुआ है । कहते हैं सन् 1936 में रामवन की स्थापना ब्रह्मलीन श्री शारदा प्रसाद जी ने की थी । गांव से कुछ दूरी पर एक संत ने शारदा प्रसाद को बताया था कि प्रभु श्री राम के कदम सतना की इस पवित्र धरती पर पड़े थे और यहां पर उन्होंने पूरी एक रात बितायी थी । इसलिए इस जगह पर किसी पवित्र स्थान का निर्माण अवश्य करना चाहिए । संत की इन्हीं बातों से प्रेरित होकर और प्रभु राम के प्रति अथाह श्रद्धा भाव के कारण उन्होंने यहां पर रामवन की स्थापना की । इस तरह उन्होंने विरान पड़े जंगल को एक भव्य पर्यटन स्थल में बदल दिया । आज रामवन मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है ।
पंचवटी में राम- वर्तमान में पंचवटी महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है । गोदावरी नदी के उद्गम स्थान से 20 मील की दूरी पर यह स्थान है । इस स्थान पर पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक पांच प्रकार के वृक्ष उपस्थित होने के कारण ही इसे पंचवटी के नाम से जाना जाता है । कहते हैं गोदावरी नदी में स्नान के बाद जब भगवान श्री राम यहां पधारे थे तो उन्होंने सीता मैया और लक्ष्मण के साथ स्वयं अपने हाथों से इन वृक्षों को लगाया था । उस काल में यह स्थान दंडक वन के अंतर्गत आता था । इसके अलावा यही वो स्थान था जहां पर लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काटी थी और खर व दूषण से युद्ध किया था ।
रामेश्वरम तीर्थ- जैसे उत्तर भारत में काशी का महत्व है वैसे ही दक्षिण में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित रामेश्वरम का है । यह तीर्थ स्थान हिंदूओं के चार धामों में से एक है । हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ यह एक सुंदर द्वीप है । यह वही जगह थी जहां पर भगवान श्री राम ने अपनी वानर सेना के साथ लंका तक पहुंचने के लिये पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था । रामेश्वरम का यह मंदिर भारतीय निर्माण कला और शिल्पकला का एक बेहद ही सुंदर नमूना है । इसके प्रवेश द्वार की ऊंचाई चालीस फीट है । मंदिर के अंदर सैकड़ों विशाल खंबे बने हुए हैं, जिन पर बहुत ही महीन बेल-बूटे की सुंदर कारीगरी की गई है ।
श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर- पंजाब राज्य में अमृतसर से 11 कि.मी दूर अमृतसर-चोगावा रोड पर ‘श्री राम तीर्थ मंदिर’ स्थित है। यही वह स्थान था जहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम स्थित था । श्री राम द्वारा माता सीता का परित्याग करने पर वाल्मीकि जी ने उन्हें यहां आश्रय दिया था । आज भी बेघर लोग इस मंदिर में आकर ईंटों के छोटे-छोटे घर बनाकर अपने घर के लिये मन्नत मांगते हैं । यहीं पर श्री राम पुत्र लव-कुश का जन्म हुआ था और महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी । इस मंदिर के समीप एक सरोवर है। कहा जाता है कि इस सरोवर को स्वयं राम भक्त हनुमान ने खोदकर बनाया था । इस मंदिर के समीप ही रामायण से जुड़े कई अन्य स्थान प्राचीन श्री रामचंद्र मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, राम-लक्ष्मण-सीता मंदिर, महर्षि वाल्मीकि जी की धूनी, सीता जी की कुटिया, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, सीता राम-मिलाप मंदिर भी हैं । प्रत्येक वर्ष नवम्बर के महीने में पूर्णिमा के दिन से यहां चार दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है ।
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